JDU का डबल धमाका, मोदी के ‘हनुमान’ की सर्जिकल स्ट्राइक!

Bihar Results 2025: एनडीए की अन्य सहयोगी पार्टियों का प्रदर्शन भी मजबूत रहा है. हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (HAM) ने 6 सीटों पर चुनाव लड़ा है और 4 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है.

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के अब तक सामने आए रुझानों ने राजनीतिक पंडितों को झकझोर दिया है। पारंपरिक समीकरणों को दरकिनार करते हुए, एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) भारी बहुमत की ओर मजबूत तरीके से बढ़ता दिख रहा है, जबकि महागठबंधन (इंडिया ब्लॉक) रुझानों में हाशिए पर नजर आ रहा है।

JDU का डबल धमाका, मोदी के ‘हनुमान’ की सर्जिकल स्ट्राइक!
JDU का डबल धमाका, मोदी के ‘हनुमान’ की सर्जिकल स्ट्राइक!

मौजूदा रुझानों के मुताबिक, 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में एनडीए लगभग 191 सीटों पर आगे चल रहा है — यह आंकड़ा विश्लेषकों के लिए एक चौंकाने वाला संकेत है, क्योंकि यह पारंपरिक शक्ति-समझौतों को पूरी तरह उलट सकता है। (वास्तव में, यह विश्लेषण स्थानीय कई रिपोर्ट्स में उभर रहा है।)

बड़ी जीत को ओर एनडीए

बड़ी जीत को ओर एनडीए
बड़ी जीत को ओर एनडीए

इस चुनाव में जेडीयू ने 101 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे और अब तक 76 सीटों पर बढ़त हासिल की हुई है. पिछली बार 2020 के चुनाव में जेडीयू ने 115 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन केवल 43 सीटें जीत पाई थी. इस बार के रुझान पिछले चुनाव की तुलना में जेडीयू के प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार दिखाते हैं. वहीं, बीजेपी ने भी 101 सीटों पर चुनाव लड़ा है और अब तक मिले रुझानों के अनुसार 84 सीटों पर आगे चल रही है. 2020 में बीजेपी ने 110 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और 74 सीटें जीती थीं.

एनडीए की अन्य सहयोगी पार्टियों का प्रदर्शन भी मजबूत रहा है. हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (HAM) ने 6 सीटों पर चुनाव लड़ा है और 4 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है. चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने इस बार एनडीए में शामिल होकर 29 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं, जिनमें से 20 सीटों पर वह बढ़त में है. 2020 में एलजेपी (आर) ने गठबंधन से अलग होकर 135 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन केवल एक सीट जीत सकी थी. इस बार का प्रदर्शन उनके लिए राजनीतिक पुनर्जीवन जैसा माना जा रहा है.

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव के कई गहरे और जटिल कारण हैं। सबसे पहले, एनडीए की विकास-और-सुशासन की रणनीति इस चुनाव में मतदाताओं द्वारा फिर से पसंद की गई दिख रही है। एनडीए ने “विकसित बिहार” का एजेंडा जोरदार तरीके से पेश किया है, और लगता है कि यह मिशन जनता के बीच गूंज रहा है।

दूसरी ओर, महिला मतदाताओं की भागीदारी में रिकॉर्ड वृद्धि देखी गई है, जिसे एनडीए के एजेंडे को समर्थन देने वाली जिम्मेदार रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। एनडीए के विकास वादों ने इस समूह में ऐसा विश्वास जगाया है कि बदलाव और स्थिरता दोनों एक साथ संभव हैं।

महागठबंधन, हालांकि, रोजगार और विकास जैसे बड़े वादे लेकर आया था, लेकिन अभी तक के रुझानों में वह अपेक्षित प्रभुत्व कायम नहीं कर पाया है। एग्जिट-पोल और शुरुआती वोट गिनती दोनों में ही महागठबंधन की पकड़ कमजोर दिख रही है।

विश्लेषकों का यह भी कहना है कि इस चुनाव में सिर्फ बड़े दलों की लड़ाई नहीं हुई, बल्कि स्थानीय स्तर पर उम्मीदवार चयन, क्षेत्र-विशिष्ट रणनीति और संगठनात्मक गहराई ने फैसला करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। एनडीए ने कई सीटों पर ऐसे मजबूत स्थानीय चेहरे उतारे हैं, जो स्थानीय मतदाता आधार में गहराई से जुड़े हुए हैं।

साथ ही, महागठबंधन में सीट-शेयरिंग और घटक दलों के बीच असहमति की ख़बरें पहले से ही राजनीतिक चर्चा में थीं, और विश्लेषकों का मानना है कि यह गठबंधन की एकजुटता को कमजोर कर सकता है।

वहीं, एनडीए के अंदरूनी मतभेद भी नजर आए हैं — कुछ सहयोगी दल सीट बंटवारे की व्यवस्था को लेकर नाराज़ हैं। लेकिन फिलहाल यह मतभेद गठबंधन की अधिक व्यापक सफलता को नहीं रोक पाए दिख रहे, क्योंकि रुझान एनडीए-पक्ष में झुके हुए हैं।

इस चुनावी माहौल में, अगर एनडीए का यह बहुमत पुष्ट होता है, तो यह बिहार की राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है। ऐसी स्थिति में एनडीए फिर से सरकार बनाने की राह पर हो सकता है, जिसे अगले पाँच वर्षों के लिए राजनीतिक स्थिरता और नीति-निरंतरता के संकेत के रूप में देखा जाएगा।

दूसरी ओर, महागठबंधन के लिए यह चेतावनी है — सिर्फ बड़े वादे देना पर्याप्त नहीं। उसे अपने लोक-शक्ति आधार, नेतृत्व की छवि और संगठनात्मक नेटवर्क को फिर से मजबूत करना होगा। विशेष रूप से युवा और महिलाओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए उसे ठोस रणनीति बनानी होगी।

जब तक मतगणना पूरी नहीं होती और आधिकारिक परिणाम घोषित नहीं होते, अंतिम तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं होगी। लेकिन अभी तक का ट्रेंड स्पष्ट संदेश दे रहा है — बिहार की राजनीति इस चुनाव में पारंपरिक समीकरणों की गिरफ्त से बाहर निकलकर एक नए राजनीतिक युग की ओर बढ़ रही है, जहाँ विकास-एजेंडा, संगठनात्मक मजबूती और स्थानीय रणनीति का ज़ोर है।

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