बिहार में कांग्रेस का क्रैश—5 फैक्टर बने पार्टी की कमजोरी !

Bihar Election 2025: कांग्रेस ने इस बार 60 सीटों पर प्रत्याशी घोषित किए थे. इसमें से सिर्फ 6 ने ही जीत दर्ज की. आखिर किस वजह से कांग्रेस को इतनी कम सीटें आईं इन पांच वजहों से समझते हैं.

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव ला दिया है। एनडीए ने इस बार 243 में से 202 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया, जबकि महागठबंधन मात्र 35 सीटों पर सिमट गया। महागठबंधन की प्रमुख सहयोगी कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। कांग्रेस ने इस चुनाव में 60 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन पार्टी केवल 6 सीटों पर ही विजय हासिल कर सकी। यह प्रदर्शन न केवल कांग्रेस के लिए झटका है, बल्कि महागठबंधन की समग्र रणनीति पर भी सवाल खड़ा करता है।

बिहार में कांग्रेस का क्रैश—5 फैक्टर बने पार्टी की कमजोरी !
बिहार में कांग्रेस का क्रैश—5 फैक्टर बने पार्टी की कमजोरी !

कांग्रेस का वोट प्रतिशत इस बार 8.71% रहा, जो 2020 के मुकाबले भी गिरावट दिखाता है, जब पार्टी को 9.6 फीसदी वोट मिले थे। 2020 में कांग्रेस 19 सीटें जीती थी, जबकि 2015 में 27 और 2010 में मात्र 4 सीटों पर जीती थी। इस बार का प्रदर्शन पिछले 15 वर्षों में कांग्रेस के संघर्ष की निरंतरता को और स्पष्ट करता है। आइए समझते हैं कि किन वजहों से कांग्रेस इतनी कम सीटों पर सिमटकर रह गई।

1. महागठबंधन में कमजोर समन्वय और सीट बंटवारे की गलतियाँ

कांग्रेस की हार का सबसे बड़ा कारण महागठबंधन के भीतर समन्वय की कमी माना जा रहा है। सीट बंटवारे के दौरान कई जगह स्थानीय समीकरणों को नजरअंदाज किया गया, जिसके परिणामस्वरूप कांग्रेस कई ऐसी सीटों पर उतरी जहाँ उसकी जमीन पहले से कमजोर थी।
कई सीटों पर आरजेडी कार्यकर्ताओं और कांग्रेस समर्थकों के बीच असंतोष भी देखने को मिला, जिसकी वजह से महागठबंधन की वोट ट्रांसफर क्षमता प्रभावित हुई।

2. ज़मीनी स्तर पर संगठन का कमजोर होना

बीते वर्षों में कांग्रेस की बिहार इकाई बार-बार अंदरूनी खींचतान, नेतृत्व परिवर्तन और संगठनात्मक शिथिलता से जूझती रही।
गाँव-गाँव तक पहुँचने वाला मजबूत कैडर, बूथ-स्तर पर कार्यकर्ताओं की उपस्थिति और चुनावी मशीनरी का अभाव कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी बन गया।

इस बार भी कई जगह देखा गया कि कांग्रेस उम्मीदवारों के पास न तो पर्याप्त स्थानीय नेटवर्क था और न ही चुनाव लड़ने के लिए आवश्यक संसाधन।

3. प्रचार अभियान का फीका प्रदर्शन

जहाँ बीजेपी और जेडीयू जैसे दल लगातार बड़े नेताओं की जनसभाओं, रोडशो और डिजिटल कैंपेन के जरिए जनता तक पहुँचते रहे, वहीं कांग्रेस का प्रचार उतना आक्रामक नहीं दिखा।
महागठबंधन की ओर से तेजस्वी यादव ने तो बड़ी रैलियाँ कीं, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व का अभियान अपेक्षाकृत धीमा और बिखरा हुआ नजर आया।

कई स्टार प्रचारक देर से मैदान में आए, जिससे चुनावी माहौल बनाने में पार्टी पिछड़ गई। डिजिटल प्रचार के मोर्चे पर भी कांग्रेस ने प्रभावी परिणाम नहीं दिए।

4. उम्मीदवार चयन में स्थानीय समीकरणों की अनदेखी

कांग्रेस ने इस बार कई नई सीटों पर दांव खेला, लेकिन उम्मीदवार चयन में स्थानीय जातीय और सामाजिक समीकरणों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।
कुछ सीटों पर ऐसे उम्मीदवार उतरे जिनका उस क्षेत्र से कोई गहरा संबंध नहीं था, जिससे स्थानीय जनता का भरोसा जीतना मुश्किल हो गया।
जबकि एनडीए ने सीट-दर-सीट माइक्रो प्लानिंग की और स्थानीय समीकरणों के अनुरूप टिकट वितरण किया।

5. ‘कांग्रेस फैक्टर’ का कमजोर होना और राष्ट्रीय बनाम स्थानीय मुद्दे

बिहार की राजनीति में कांग्रेस का पारंपरिक जनाधार वर्षों से कमजोर होता जा रहा है।
इस चुनाव में भी पार्टी राष्ट्रीय मुद्दों पर अधिक जोर देती दिखी, जबकि एनडीए और आरजेडी दोनों ने क्षेत्रीय मुद्दों—जैसे बेरोजगारी, सड़क, बिजली, कानून व्यवस्था और स्थानीय विकास—पर ज्यादा फोकस किया।

कांग्रेस की राज्य-स्तरीय रणनीति स्पष्ट और प्रभावशाली नहीं रही, जिसकी वजह से पार्टी मतदाताओं को यह विश्वास नहीं दिला सकी कि वह एक मजबूत विकल्प बन सकती है।

अगला रास्ता?

कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि पार्टी परिणामों की समीक्षा करेगी और नए सिरे से संगठन को मजबूत करेगी।
हालांकि, यह साफ है कि यदि कांग्रेस को बिहार की राजनीति में फिर से जगह बनानी है, तो उसे बूथ स्तर से लेकर नेतृत्व स्तर तक बड़े बदलाव करने होंगे।

2025 का चुनाव यह सिद्ध कर गया कि बिहार में बिना मजबूत ज़मीनी संगठन और स्थानीय रणनीति के कोई भी दल लंबे समय तक टिक नहीं सकता—और कांग्रेस को अभी यही सबसे बड़ी चुनौती का सामना करना है।

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