मुंबई कांग्रेस ने शिविर में बड़ा फैसला लेते हुए बीएमसी चुनाव अपने दम पर लड़ने की रणनीति तय की है. महाविकास आघाड़ी से अलग होकर सभी वार्डों में उम्मीदवार उतारने की तैयारी तेज हो गई है.
महाराष्ट्र की राजनीति में शनिवार, 15 नवंबर को एक बड़ा राजनीतिक संकेत देखने को मिला, जब मुंबई कांग्रेस ने आगामी बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनाव को लेकर एक अहम फैसला लेने की दिशा में कदम बढ़ाया। कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रभारी रमेश चेन्निथला की मौजूदगी में आयोजित इस बड़े शिविर में पार्टी के कई वरिष्ठ नेता, पदाधिकारी और कार्यकर्ता शामिल हुए। बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के बेहद निराशाजनक प्रदर्शन के बाद पार्टी अब महाराष्ट्र में अपनी रणनीति को नए सिरे से गढ़ने में जुट गई है। इसी कड़ी में मुंबई कांग्रेस ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह बीएमसी चुनाव अपने दम पर लड़ने की तैयारी कर रही है।

मुंबई कांग्रेस के भीतर पिछले कई महीनों से यह मांग उठ रही थी कि पार्टी बृहन्मुंबई महापालिका चुनाव में महाविकास आघाड़ी के सहारे न चलकर अपनी स्वतंत्र पहचान के साथ मैदान में उतरे। कार्यकर्ताओं का तर्क था कि मुंबई जैसे महत्वपूर्ण महानगर में कांग्रेस की ऐतिहासिक साख रही है, इसलिए उसे अपना संगठन मजबूत करते हुए अकेले चुनाव लड़ना चाहिए। इस शिविर ने इस मांग को न केवल तेज किया बल्कि पार्टी के भीतर व्यापक स्तर पर इसे समर्थन भी मिल गया।
शिविर में मौजूद राष्ट्रीय प्रभारी रमेश चेन्निथला ने कार्यकर्ताओं की राय का सम्मान करते हुए कहा कि बीएमसी चुनाव को लेकर अंतिम फैसला प्रदेश कांग्रेस कमेटी लेगी, लेकिन स्थानीय नेतृत्व की सोच और सुझाव को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी। उन्होंने साफ कहा कि “स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं का मनोबल ही किसी भी चुनाव की सफलता तय करता है। अगर मुंबई कांग्रेस एकजुट होकर अपने दम पर चुनाव लड़ने का प्रस्ताव रखती है, तो इसे गंभीरता से लिया जाएगा।”
चेन्निथला का यह बयान कांग्रेस की भावी रणनीति में बड़े बदलाव का संकेत देता है। महाविकास आघाड़ी के गठन के बाद, कांग्रेस अक्सर उसी गठबंधन ढांचे में चुनाव लड़ती रही है। लेकिन बीएमसी, जो कि देश की सबसे अमीर नगर निगमों में से एक है, उसके चुनाव को लेकर कांग्रेस अपनी खोई हुई पकड़ वापस हासिल करना चाहती है। पार्टी के कई नेताओं का मानना है कि मुंबई में स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने से कांग्रेस को अपनी ताकत आकलन करने का मौका मिलेगा और शहर में उसका जनाधार भी मजबूत होगा।
इस शिविर में संगठनात्मक मुद्दों, बूथ मैनेजमेंट, युवा और महिला कार्यकर्ताओं की भूमिका, डिजिटल कैंपेन और स्थानीय स्तर पर जनता से सीधा संवाद बढ़ाने जैसी रणनीतियों पर भी चर्चा हुई। यह बातें इस ओर इशारा करती हैं कि कांग्रेस इस बार बीएमसी चुनाव को हल्के में नहीं ले रही, बल्कि उसे एक बड़े राजनीतिक पुनर्जीवन के मौके के रूप में देख रही है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने यह भी माना कि बिहार में कमजोर प्रदर्शन के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल नीचे था, लेकिन मुंबई शिविर ने उनमें नई ऊर्जा का संचार किया है। मुंबई महानगर में कांग्रेस के पास पारंपरिक वोट बैंक और स्थानीय नेताओं का मजबूत नेटवर्क है, जिसे सही रणनीति के साथ पुनर्जीवित किया जा सकता है। पार्टी का मानना है कि अलग होकर लड़े गए चुनावों में कांग्रेस को अपनी वास्तविक ताकत का अंदाजा बेहतर तरीके से मिलता है, जबकि गठबंधन में वह कहीं न कहीं दबकर रह जाती है।
उधर, कांग्रेस के इस संकेत से शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) और एनसीपी (शरद पवार गुट) की मुश्किलें बढ़ सकती हैं, क्योंकि महाविकास आघाड़ी की संयुक्त लड़ाई हमेशा भाजपा और एनडीए के खिलाफ एक बड़ी चुनौती पेश करती रही है। यदि कांग्रेस बीएमसी चुनाव में अलग होने का निर्णय लेती है, तो यह शिवसेना (UBT) के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है, खासकर इसलिए क्योंकि बीएमसी शिवसेना का गढ़ है और वह किसी भी तरह विपक्षी वोटों के बिखराव से बचना चाहेगी।
कुल मिलाकर, मुंबई कांग्रेस के इस बड़े शिविर ने शहर की राजनीतिक हवा में नई हलचल पैदा कर दी है। अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि राज्य और राष्ट्रीय स्तर की कांग्रेस नेतृत्व इस प्रस्ताव पर क्या अंतिम निर्णय लेती है। लेकिन इतना तय है कि कांग्रेस ने बीएमसी चुनाव को लेकर अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं — वह अब और पीछे हटने को तैयार नहीं।
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