नूरी जामा मस्जिद विवाद सुलझा: हाईकोर्ट ने दी संरक्षा की गारंटी !

राज्य सरकार की तरफ से प्रस्तुत अतिरिक्त महाधिवक्ता ने कोर्ट को जानकारी दी कि मस्जिद के जिस हिस्से ने सरकारी भूमि पर अतिक्रमण किया था, उसे पहले ही हटाया जा चुका है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फतेहपुर की ऐतिहासिक नूरी जामा मस्जिद से जुड़े ध्वस्तीकरण विवाद पर एक अहम फैसला सुनाते हुए याचिका का निपटारा कर दिया है। अदालत ने इस मामले में राज्य सरकार द्वारा दिए गए लिखित आश्वासन को आधार बनाया, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि सड़क चौड़ीकरण कार्य के लिए मस्जिद के जिस हिस्से को हटाना आवश्यक था, वह तोड़फोड़ पहले ही की जा चुकी है और अब आगे किसी भी प्रकार की ध्वस्तीकरण कार्रवाई नहीं की जाएगी। इस आश्वासन के बाद अदालत ने कहा कि मस्जिद की ओर से दायर याचिका अब निष्प्रभावी हो गई है और इसे निस्तारित किया जाता है।

नूरी जामा मस्जिद विवाद सुलझा: हाईकोर्ट ने दी संरक्षा की गारंटी !
नूरी जामा मस्जिद विवाद सुलझा: हाईकोर्ट ने दी संरक्षा की गारंटी !

राज्य सरकार ने दी स्पष्ट जानकारी

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि सार्वजनिक मार्ग को चौड़ा करने के लिए संरचना के सिर्फ उन्हीं भागों को हटाया गया, जो परियोजना के लिए अनिवार्य थे। सरकार ने अदालत को भरोसा दिलाया कि मस्जिद के शेष भाग को किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा। राज्य की इस स्थिति को रिकॉर्ड पर लेते हुए अदालत ने मामले का समाधान सुनिश्चित किया और आगे की कार्रवाई पर रोक का संकेत देते हुए कहा कि मस्जिद का कोई और हिस्सा नहीं हटाया जाएगा।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मस्जिद प्रबंधन समिति द्वारा दिए गए जमीन के सीमांकन (demarcation) संबंधी आवेदन पर संबंधित प्रशासनिक अधिकारी कानून के अनुसार उचित कार्रवाई करेंगे। अदालत ने कहा कि मस्जिद की भूमि के वास्तविक विस्तार, सीमाओं और राजस्व अभिलेखों की जांच पूरी पारदर्शिता के साथ की जानी चाहिए, ताकि आगे कोई विवाद न उत्पन्न हो।

1839 में हुई थी मस्जिद की स्थापना

याची पक्ष ने अपने तर्कों में कहा कि नूरी जामा मस्जिद का निर्माण वर्ष 1839 में हुआ था और यह क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और धार्मिक संरचना है। मस्जिद प्रबंधन ने अदालत में दलील दी कि प्रशासन द्वारा इसे “अवैध निर्माण” बताना न केवल गलत है बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों और धार्मिक भावनाओं के विपरीत भी है। उन्होंने दावा किया कि बिना किसी वैधानिक नोटिस और उचित प्रक्रिया के मस्जिद को नुकसान पहुंचाया गया, जो संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।

मस्जिद पक्ष की ओर से यह भी कहा गया कि सड़क चौड़ीकरण के नाम पर यह कार्रवाई जल्दबाज़ी में की गई और संबंधित विभाग ने वैकल्पिक समाधान पर विचार नहीं किया। याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि मस्जिद के शेष हिस्से को सुरक्षित रखा जाए और उसकी मूल संरचना को नुकसान से बचाया जाए।

अदालत की सख्त टिप्पणी—कानून के अनुसार ही होगी आगे की प्रक्रिया

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की द्वैतीय पीठ ने सभी पक्षों को सुनने के बाद कहा कि धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों में “वैधानिक प्रक्रिया का पालन” अत्यंत आवश्यक है। अदालत ने साफ किया कि यदि मस्जिद प्रबंधन सीमांकन या किसी अन्य प्रशासनिक प्रक्रिया पर आपत्ति दर्ज कराता है, तो उस पर अधिकारी कानूनन निर्णय लेने को बाध्य होंगे।

पीठ ने कहा कि राज्य सरकार भविष्य में किसी भी प्रकार की तोड़फोड़ कार्रवाई तभी कर सकती है, जब उसके लिए स्पष्ट और विधिक आधार हो तथा मस्जिद प्रबंधन को पूरी प्रक्रिया की सूचना दी गई हो।

मामले के शांतिपूर्ण समाधान से राहत

इस फैसले के बाद स्थानीय लोगों और मस्जिद प्रबंधन में राहत का माहौल है। लंबे समय से उत्पन्न तनाव और अनिश्चितता अब काफी हद तक समाप्त हो गई है। अदालत के इस हस्तक्षेप से उम्मीद जताई जा रही है कि आगे इस तरह के मामलों में प्रशासन और नागरिकों के बीच बेहतर संवाद स्थापित होगा।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में जल्दबाज़ी से की गई कार्रवाई स्वीकार्य नहीं है और कानून एवं संवैधानिक प्रक्रिया का पालन सर्वोपरि है।

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