अनुभव सिन्हा की ‘अस्सी’: सोच मजबूत, पर पकड़ कमजोर !

अस्सी एक गंभीर सामाजिक मुद्दे पर बनी फिल्म है जो महिलाओं की सुरक्षा और न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाती है। कानी कुसरुति का सधा अभिनय फिल्म की ताकत है, जबकि तापसी पन्नू औसत लगती हैं। अनुभव सिन्हा की मंशा मजबूत है, लेकिन कमजोर पटकथा और ढीला निर्देशन असर क

फिल्मकार अनुभव सिन्हा की फिल्मों को लेकर एक बात अक्सर कही जाती है कि उनकी नीयत पर शक नहीं किया जा सकता। वे क्या कहना चाहते हैं, यह आमतौर पर बिल्कुल साफ होता है। लेकिन वे उसे किस तरह कहते हैं, यही उनकी फिल्मों की असली कसौटी बन जाती है।

उनकी नई फिल्म अस्सी भी इसी नाजुक रस्सी पर संतुलन साधने की कोशिश करती नजर आती है। यह एक ऐसी फिल्म है जो अपने विषय की गंभीरता के कारण सम्मान की मांग करती है, लेकिन सिनेमाई प्रस्तुति के स्तर पर कई बार लड़खड़ा जाती है।

अनुभव सिन्हा की ‘अस्सी’: सोच मजबूत, पर पकड़ कमजोर !
अनुभव सिन्हा की ‘अस्सी’: सोच मजबूत, पर पकड़ कमजोर !

‘अस्सी’ एक गंभीर और सोचने पर मजबूर करने वाली फिल्म है। यह दर्शकों को मनोरंजन देने के इरादे से नहीं बनाई गई, बल्कि समाज की एक कड़वी और डरावनी सच्चाई से रूबरू कराने की कोशिश करती है। फिल्म महिलाओं की सुरक्षा जैसे बेहद संवेदनशील और अहम मुद्दे को केंद्र में रखती है, खासकर दिल्ली जैसे महानगर की पृष्ठभूमि में, जहां इस विषय पर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।

फिल्म की शुरुआत ही एक चौंकाने वाले आंकड़े से होती है—भारत में हर साल करीब 30 हजार बलात्कार के मामले दर्ज होते हैं। यह सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक गहरा सवाल है। क्या हम सच में इस समस्या को रोकने के लिए कुछ कर रहे हैं, या फिर हर बार कुछ समय की बहस के बाद सब कुछ भुला दिया जाता है?

फिल्म यह भी स्पष्ट करती है कि सभी पुरुष अपराधी नहीं होते, लेकिन जो अपराध करते हैं, उन्हें सामाजिक शर्म और कड़ी सजा दोनों मिलनी चाहिए। इसी सोच के साथ फिल्म आगे बढ़ती है और घटना को सनसनीखेज बनाने के बजाय उसके बाद के मानसिक, सामाजिक और कानूनी संघर्ष पर फोकस करती है।

कहानी

कहानी परीमा के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसका किरदार कानी कुसरुति ने निभाया है। एक रात परीमा अकेली घर लौट रही होती है, तभी उसका अपहरण कर लिया जाता है और उसके साथ बेहद अमानवीय व्यवहार होता है। इस भयावह घटना को फिल्म सीधे-सीधे दिखाने के बजाय, उसके बाद के असर पर ज्यादा ध्यान देती है। परीमा को रेलवे ट्रैक पर छोड़ दिया जाता है और वहीं से शुरू होती है उसकी टूटती हुई मानसिक दुनिया और न्याय की लंबी, थकाऊ लड़ाई।

कहानी
कहानी

परीमा के केस की पैरवी करने आती हैं वकील रावी, जिनका किरदार तापसी पन्नू ने निभाया है। रावी पूरी ईमानदारी और जज्बे के साथ केस लड़ती हैं, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, मामला कमजोर होता जाता है। परीमा अपराधियों की पहचान नहीं कर पाती, डीएनए रिपोर्ट मेल नहीं खाती और पुख्ता सबूतों की कमी अदालत में केस को खोखला बना देती है। कोर्टरूम ड्रामा के हिस्से मौजूद तो हैं, लेकिन वे उतनी धार नहीं पकड़ पाते जितनी इस विषय के लिए जरूरी थी।

‘अम्ब्रेला मैन’ और अधूरी परतें

कहानी में आगे “अम्ब्रेला मैन” नाम का एक रहस्यमयी आंदोलन सामने आता है, जो सिस्टम से निराश लोगों की आवाज बनने का दावा करता है और अपने तरीके से न्याय की बात करता है। यह विचार अपने आप में दिलचस्प है, लेकिन फिल्म इस पहलू को गहराई से टटोल नहीं पाती। यह हिस्सा ऐसा लगता है मानो बड़ी संभावनाओं के बावजूद अधूरा छोड़ दिया गया हो।

कमजोरियां और प्रभाव

फिल्म का विषय बेहद मजबूत है, लेकिन इसकी लिखावट में कुछ साफ कमियां नजर आती हैं। आज के दौर में मोबाइल लोकेशन, सीसीटीवी फुटेज और डिजिटल सबूत जैसे पहलुओं को कहानी में और प्रभावी ढंग से शामिल किया जा सकता था। क्लाइमैक्स भी थोड़ा लंबा और खिंचा हुआ महसूस होता है, जिससे फिल्म का असर कमजोर पड़ता है।

निष्कर्ष

‘अस्सी’ एक जरूरी फिल्म है, जो समाज को आईना दिखाने की ईमानदार कोशिश करती है। कानी कुसरुति अपने किरदार में गहरी छाप छोड़ती हैं, जबकि तापसी पन्नू का प्रदर्शन इस बार उतना प्रभावी नहीं लग पाता। अनुभव सिन्हा की मंशा सराहनीय है, लेकिन बेहतर पटकथा और सशक्त प्रस्तुति के साथ यह फिल्म कहीं ज्यादा असरदार बन सकती थी। इरादों में बड़ी और सोच में मजबूत होने के बावजूद, ‘अस्सी’ असर के मामले में आधी रह जाती है।

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