उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शिक्षामित्रों के लिए विधानसभा सत्र में बड़ा ऐलान किया है. उनके इस ऐलान को चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है.
उत्तर प्रदेश में शिक्षामित्रों के लिए राज्य सरकार ने एक बड़ा और लंबे समय से प्रतीक्षित फैसला लिया है। राज्य विधानमंडल के बजट सत्र के दौरान विधानसभा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शिक्षामित्रों के मानदेय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी का ऐलान किया। मुख्यमंत्री ने शुक्रवार, 20 फरवरी को सदन में बताया कि 1 अप्रैल से शिक्षामित्रों को प्रतिमाह 18,000 रुपये मानदेय मिलेगा, जबकि अभी तक उन्हें 10,000 रुपये ही दिए जा रहे थे। इसके साथ ही शिक्षामित्रों को 5 लाख रुपये तक का कैशलेस इलाज उपलब्ध कराने की भी घोषणा की गई है।

मुख्यमंत्री के इस ऐलान को शिक्षामित्रों के लिए बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है। राज्य में वर्तमान में करीब डेढ़ लाख शिक्षामित्र कार्यरत हैं, जो संविदा पर प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। लंबे समय से शिक्षामित्र अपने मानदेय में बढ़ोतरी और सामाजिक सुरक्षा की मांग कर रहे थे। सरकार के इस फैसले से उनकी आय में लगभग 80 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी, जो अब तक की सबसे बड़ी वृद्धि मानी जा रही है।

विधानसभा में बोलते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विपक्ष पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि पिछली सरकारों के दौरान शिक्षामित्रों और अनुदेशकों को मात्र 3,000 रुपये मानदेय दिया जाता था, जबकि उनकी सरकार ने इसे पहले 10,000 रुपये तक बढ़ाया और अब अप्रैल से 18,000 रुपये किया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि सरकार शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए शिक्षामित्रों और अनुदेशकों को आर्थिक रूप से सशक्त करने पर लगातार काम कर रही है।
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि यह फैसला केवल शिक्षामित्रों तक सीमित नहीं है। सरकार ने अनुदेशकों के लिए भी अहम घोषणा की है। अब अनुदेशकों को 17,000 रुपये प्रतिमाह मानदेय मिलेगा। प्रदेश में करीब 28 हजार अनुदेशक कार्यरत हैं, जो विभिन्न विद्यालयों में खेल, कला और अन्य गतिविधियों से जुड़े विषयों को पढ़ाते हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि अनुदेशकों के भुगतान को लेकर जो भी समस्याएं थीं, उन्हें दूर करने के लिए सरकार ने तत्काल भुगतान की व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
सरकार के इस ऐलान को आगामी विधानसभा चुनावों से जोड़कर भी देखा जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शिक्षामित्रों और अनुदेशकों की बड़ी संख्या को देखते हुए यह फैसला चुनावी दृष्टि से भी अहम है। हालांकि सरकार की ओर से इसे शिक्षा क्षेत्र में सुधार और कर्मचारियों के हित में उठाया गया कदम बताया गया है।
इस बजट सत्र के दौरान समाजवादी पार्टी समेत तमाम विपक्षी दलों ने शिक्षामित्रों और अनुदेशकों के मानदेय का मुद्दा जोर-शोर से उठाया था। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कई मौकों पर सरकार को घेरते हुए कहा था कि शिक्षामित्र वर्षों से कम मानदेय में काम करने को मजबूर हैं और उनके भविष्य को लेकर सरकार को ठोस नीति बनानी चाहिए। इसके अलावा सपा विधायक रागिनी सोनकर ने भी विधानसभा में शिक्षामित्रों की समस्याओं को उठाया था और मानदेय बढ़ाने की मांग की थी।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विपक्ष की आलोचनाओं का जवाब देते हुए कहा कि उनकी सरकार सिर्फ घोषणाएं नहीं करती, बल्कि उन्हें जमीन पर उतारती भी है। उन्होंने दावा किया कि शिक्षा मित्रों और अनुदेशकों के हित में यह फैसला सरकार की संवेदनशीलता को दर्शाता है। साथ ही उन्होंने कहा कि शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए शिक्षकों और शिक्षण से जुड़े कर्मियों का संतुष्ट होना बेहद जरूरी है।
कुल मिलाकर, सरकार के इस फैसले से प्रदेश के शिक्षामित्रों और अनुदेशकों में उत्साह देखने को मिल रहा है। मानदेय में बढ़ोतरी और कैशलेस इलाज जैसी सुविधाओं से न केवल उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी, बल्कि उन्हें सामाजिक सुरक्षा का भी भरोसा मिलेगा। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस फैसले का शिक्षा व्यवस्था और प्रदेश की राजनीति पर क्या असर पड़ता है।
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