पार्टी के सूत्रों के मुताबिक मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर सपा अपने उम्मीदवार उतार सकती है, जो कम से कम 10 हो सकती हैं.इसके पीछे रणनीति पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलानी है.
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 में अभी करीब एक साल से कुछ अधिक का समय बाकी है, लेकिन सियासी हलचल अभी से तेज होती दिखाई दे रही है। प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी (सपा) अब अपनी राजनीतिक जमीन यूपी से बाहर भी मजबूत करने की तैयारी में जुटी नजर आ रही है। इसी क्रम में इस साल होने वाले असम विधानसभा चुनाव में सपा के उतरने की चर्चा ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है।

पार्टी सूत्रों के मुताबिक समाजवादी पार्टी असम की कुछ मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की रणनीति पर विचार कर रही है। माना जा रहा है कि सपा कम से कम 10 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार सकती है। हालांकि अभी इस पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है, लेकिन पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर लगातार मंथन चल रहा है।
दरअसल, इसके पीछे सपा की बड़ी रणनीति राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान मजबूत करना है। सपा नेतृत्व का मानना है कि अगर पार्टी अन्य राज्यों में भी चुनावी मैदान में उतरकर अच्छा वोट प्रतिशत हासिल करती है, तो उसे राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने की दिशा में मदद मिल सकती है।
राष्ट्रीय पार्टी बनने की रणनीति
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा पाने के लिए किसी भी दल को कम से कम चार राज्यों में छह फीसदी से अधिक वोट हासिल करने होते हैं। इसके अलावा कुछ अन्य शर्तें भी होती हैं। ऐसे में सपा अब यूपी के अलावा अन्य राज्यों में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश कर रही है।

बीते लोकसभा चुनाव 2024 में समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में शानदार प्रदर्शन करते हुए 37 सीटें जीती थीं। इस प्रदर्शन के बाद सपा देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। इसी सफलता के बाद पार्टी अब अपने विस्तार की रणनीति पर काम कर रही है।
कांग्रेस के लिए बढ़ सकती है चुनौती
हालांकि असम में सपा की संभावित एंट्री कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है। असम में कांग्रेस फिलहाल मुख्य विपक्षी पार्टी है और आगामी चुनाव को लेकर काफी सक्रिय भी है। कांग्रेस का फोकस राज्य में भाजपा के खिलाफ मजबूत चुनौती पेश करने पर है।
ऐसे में अगर सपा मुस्लिम बहुल सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारती है तो विपक्षी वोटों का बंटवारा हो सकता है, जिसका सीधा असर कांग्रेस के प्रदर्शन पर पड़ सकता है। यही वजह है कि राजनीतिक विश्लेषक इसे इंडिया गठबंधन के भीतर नई सियासी खींचतान के रूप में भी देख रहे हैं।
अखिलेश यादव भी कर सकते हैं प्रचार
पार्टी सूत्रों का कहना है कि अगर सपा असम चुनाव में उतरती है तो पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव खुद भी वहां चुनाव प्रचार के लिए जा सकते हैं। इससे पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ाने और मतदाताओं के बीच पहचान बनाने में मदद मिल सकती है।
सपा के लिए असम में संभावनाएं इसलिए भी देखी जा रही हैं क्योंकि अखिलेश यादव और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के बीच अच्छे राजनीतिक संबंध माने जाते हैं। ऐसे में यह भी संभावना जताई जा रही है कि कुछ सीटों पर सपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच तालमेल बन सकता है।
अन्य राज्यों में भी बढ़ा रही दायरा
समाजवादी पार्टी इससे पहले भी यूपी से बाहर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश कर चुकी है। महाराष्ट्र में सपा के दो विधायक चुने जा चुके हैं, जबकि गुजरात में भी पार्टी का एक विधायक जीत हासिल कर चुका है। इन सफलताओं ने पार्टी नेतृत्व को अन्य राज्यों में भी चुनाव लड़ने के लिए उत्साहित किया है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि असम में चुनाव लड़ने की रणनीति केवल विस्तार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस पर दबाव बनाने का एक तरीका भी हो सकता है। आने वाले समय में जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर गठबंधन की बातचीत होगी, तब कांग्रेस भी ज्यादा सीटों की मांग कर सकती है। ऐसे में सपा अभी से अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने की कोशिश कर रही है।
फिलहाल असम चुनाव को लेकर सपा की रणनीति पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है, लेकिन पार्टी के भीतर चल रही चर्चा ने साफ कर दिया है कि आने वाले समय में सियासत का दायरा सिर्फ राज्यों तक सीमित नहीं रहने वाला, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर नए समीकरण भी बनते-बिगड़ते दिखाई दे सकते हैं।
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