नीतीश सरकार ने शिक्षकों की बंपर भर्ती का ऐलान कर दिया है। इन नियुक्तियों में महिलाओं के लिए 35 प्रतिशत आरक्षण का लाभ केवल बिहार की मूल निवासी महिलाओं को ही दिया जाएगा।
बिहार में चुनावी हलचल तेज हो चुकी है और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए बंपर शिक्षक भर्ती का ऐलान कर दिया है। यह फैसला न केवल शिक्षा व्यवस्था को सशक्त करने की दिशा में उठाया गया है, बल्कि इसके गहरे राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। माना जा रहा है कि नीतीश कुमार ने आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया है, जिससे बेरोजगार युवाओं को साधा जा सके और सामाजिक समीकरणों को मजबूत किया जा सके।

बंपर भर्ती का ऐलान: क्या है योजना?
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हाल ही में आयोजित एक कार्यक्रम में स्पष्ट किया कि राज्य सरकार जल्द ही हजारों शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया शुरू करेगी। यह भर्ती प्राथमिक से लेकर उच्च माध्यमिक विद्यालयों तक के शिक्षकों के लिए होगी। सूत्रों के अनुसार, 1 लाख से अधिक शिक्षकों की नियुक्ति का प्रस्ताव तैयार है, जिसे आने वाले हफ्तों में अधिसूचित किया जा सकता है।
नीतीश कुमार ने अपने भाषण में कहा:
“हमारा लक्ष्य है कि बिहार के हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले। इसके लिए शिक्षकों की संख्या में भारी वृद्धि जरूरी है। नई पीढ़ी को उज्ज्वल भविष्य देने के लिए हम प्रतिबद्ध हैं।”
शिक्षा और रोजगार: एक साथ साधने की कोशिश
बिहार लंबे समय से शिक्षक रिक्तियों और बेरोजगारी की दोहरी चुनौती से जूझ रहा है। लाखों युवाओं ने शिक्षक बनने की डिग्री और प्रशिक्षण तो ले रखा है, लेकिन उन्हें नौकरी नहीं मिल पा रही। दूसरी ओर, सरकारी स्कूलों में शिक्षक की कमी के चलते शिक्षा का स्तर भी प्रभावित हो रहा है।
इस भर्ती के ज़रिए नीतीश कुमार ने एक तीर से दो निशाने साधने की कोशिश की है:
- युवाओं को रोजगार देने का वादा पूरा करना
- शिक्षा प्रणाली को सशक्त बनाना
यह फैसला बेरोजगार बीएड और डीएलएड धारकों के लिए राहतभरी खबर है, जो लंबे समय से नियुक्तियों का इंतजार कर रहे थे।
चुनावी रणनीति का हिस्सा?
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यह फैसला पूरी तरह से चुनावी रणनीति का हिस्सा है। पिछली बार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन से अलग होकर भाजपा के साथ सरकार बनाने के बाद नीतीश कुमार को अपने जनाधार में गिरावट का सामना करना पड़ा। अब जबकि चुनाव नजदीक हैं, नीतीश एक बार फिर अपने पारंपरिक वोट बैंक – शिक्षित बेरोजगार, मध्यम वर्ग और ग्रामीण तबके को साधने की कोशिश कर रहे हैं।
शिक्षक भर्ती का मुद्दा सीधे तौर पर युवाओं, शिक्षा समर्थकों और उनके परिवारों से जुड़ा होता है, जो चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
विपक्ष की प्रतिक्रिया
नीतीश कुमार के इस ऐलान पर विपक्ष ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। राजद नेता तेजस्वी यादव ने कहा:
“नीतीश जी को चुनाव आते ही युवाओं की याद आती है। ये सब सिर्फ दिखावा है। पहले की भर्तियों का क्या हुआ? कितनों को नौकरी मिली?”
हालांकि जदयू नेताओं का कहना है कि नीतीश सरकार ने शिक्षा और प्रशासनिक सेवा दोनों में पारदर्शिता के साथ नियुक्तियां की हैं, और यह फैसला जनता की ज़रूरत को समझते हुए लिया गया है।
ग्रामीण क्षेत्रों पर खास ध्यान
इस बार की शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में सरकार का जोर ग्रामीण एवं पिछड़े इलाकों में स्कूलों को शिक्षक उपलब्ध कराने पर होगा। खासकर ऐसे जिलों में जहां शैक्षणिक संसाधनों की भारी कमी है, वहां प्राथमिकता के आधार पर नियुक्तियां की जाएंगी। इससे ग्रामीण शिक्षा में सुधार की उम्मीद भी जताई जा रही है।
निष्कर्ष
नीतीश कुमार का यह फैसला केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि एक चतुर राजनीतिक चाल भी है। बंपर शिक्षक भर्ती के जरिए वे एक तरफ राज्य की शिक्षा प्रणाली को मजबूती देना चाहते हैं, तो दूसरी ओर युवाओं और शिक्षित वर्ग को अपने पक्ष में करना चाहते हैं। अब देखना यह होगा कि यह दांव कितना असर दिखाता है और क्या यह उन्हें आगामी विधानसभा चुनावों में एक बार फिर सत्ता के शिखर तक पहुंचा पाएगा।
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