Samajwadi Party के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पूर्व आईपीएस प्रशांत कुमार की उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग में बतौर अध्यक्ष नियुक्ति पर तंज कसा है.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर नियुक्तियों को लेकर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) प्रशांत कुमार को सेवानिवृत्ति के बाद एक नई और अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है। उन्हें उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग, प्रयागराज का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। इस नियुक्ति के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चाएं शुरू हो गई हैं और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने चिर-परिचित अंदाज में इस पर प्रतिक्रिया दी है।

प्रशांत कुमार को मिली नई जिम्मेदारी
राज्य सरकार की ओर से बुधवार, 17 दिसंबर को जारी आधिकारिक बयान के मुताबिक, राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग अधिनियम, 2023 की धारा-4 के तहत प्रदत्त शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए प्रशांत कुमार की नियुक्ति को मंजूरी दी है।

यह नियुक्ति ऐसे समय में की गई है, जब शिक्षा विभाग में भर्तियों और चयन प्रक्रिया को लेकर सरकार पारदर्शिता और सुधार की बात कर रही है।
संशोधित अधिनियम के तहत नियुक्ति
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग अधिनियम, 2023 को हाल ही में उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग (संशोधन) अध्यादेश, 2025 के माध्यम से संशोधित किया गया है। इसी संशोधित प्रावधान के तहत प्रशांत कुमार को आयोग का अध्यक्ष बनाया गया है।
सरकार का कहना है कि प्रशासनिक अनुभव रखने वाले अधिकारियों की नियुक्ति से आयोग का कामकाज और अधिक प्रभावी होगा।
अखिलेश यादव का तंज

पूर्व DGP प्रशांत कुमार की नियुक्ति पर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।
18 दिसंबर, गुरुवार को राजधानी लखनऊ स्थित सपा मुख्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान जब उनसे इस नियुक्ति को लेकर सवाल पूछा गया, तो अखिलेश ने तंज कसते हुए कहा—
“बधाई हो, फेक एनकाउंटर के बाद अब फेक भर्तियां देखने को मिलेंगी।”
अखिलेश यादव का यह बयान सामने आते ही राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई। उन्होंने सीधे तौर पर सरकार की मंशा और नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए।
सपा का आरोप
समाजवादी पार्टी का आरोप है कि भाजपा सरकार में प्रशासनिक और संवैधानिक संस्थाओं का राजनीतिक इस्तेमाल किया जा रहा है। अखिलेश यादव ने संकेत दिया कि जिस तरह पुलिस विभाग में कथित तौर पर फर्जी एनकाउंटर का आरोप लगता रहा है, उसी तरह अब शिक्षा विभाग की भर्तियों पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं।
सपा नेताओं का कहना है कि शिक्षा सेवा चयन आयोग जैसे महत्वपूर्ण संस्थान की जिम्मेदारी किसी शिक्षाविद् या अकादमिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को दी जानी चाहिए थी।
सरकार का पक्ष
हालांकि, सरकार समर्थकों का कहना है कि प्रशांत कुमार एक वरिष्ठ और अनुभवी प्रशासनिक अधिकारी रहे हैं। पुलिस महानिदेशक जैसे संवेदनशील पद पर रहकर उन्होंने कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक कार्यों का लंबा अनुभव हासिल किया है, जिसका लाभ आयोग को मिलेगा।
सरकार का तर्क है कि आयोग में पारदर्शिता, अनुशासन और समयबद्ध कार्यप्रणाली सुनिश्चित करने के लिए ऐसे अधिकारियों की जरूरत होती है।
प्रशांत कुमार का प्रशासनिक सफर
प्रशांत कुमार भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के वरिष्ठ अधिकारी रह चुके हैं और उत्तर प्रदेश में पुलिस महानिदेशक के पद पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं। उनके कार्यकाल के दौरान कानून-व्यवस्था को लेकर कई फैसले चर्चा में रहे।
अब सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें शिक्षा क्षेत्र से जुड़ी एक संवैधानिक संस्था की जिम्मेदारी दी गई है, जिसे लेकर समर्थन और विरोध दोनों सामने आ रहे हैं।
राजनीतिक मायने
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह नियुक्ति केवल प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस का नया मुद्दा बन चुकी है। अखिलेश यादव का बयान इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में शिक्षा सेवा चयन आयोग की हर भर्ती प्रक्रिया विपक्ष की पैनी नजर में रहेगी।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, पूर्व DGP प्रशांत कुमार की उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति ने राज्य की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। जहां सरकार इसे प्रशासनिक मजबूती से जोड़कर देख रही है, वहीं विपक्ष इसे संस्थाओं के राजनीतिकरण का उदाहरण बता रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि आयोग के कामकाज और भर्तियों को लेकर यह बहस किस दिशा में जाती है।
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