यूपी में इस साल अप्रैल मई के महीने में पंचायत चुनाव कराए जा सकते हैं. पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर भी दावा कर चुके हैं कि यूपी में पंचायत चुनाव अपने समय पर ही कराए जाएंगे.
उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर सियासी और प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है। चुनाव से पहले आरक्षण और संवैधानिक प्रक्रियाओं को लेकर उठ रहे सवालों के बीच योगी आदित्यनाथ सरकार ने बड़ा कदम उठाने का संकेत दिया है। राज्य सरकार ने साफ किया है कि पंचायत चुनाव से पहले राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग (OBC आयोग) का गठन किया जाएगा और उसी आयोग की रिपोर्ट के आधार पर चुनाव संपन्न कराए जाएंगे। यह जानकारी सरकार की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में सुनवाई के दौरान दी गई।

यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में दाखिल एक जनहित याचिका (PIL) के जरिए सामने आया था। याचिका में कहा गया था कि उत्तर प्रदेश में राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग का कार्यकाल करीब पांच महीने पहले ही समाप्त हो चुका है, लेकिन अब तक नए आयोग का गठन नहीं किया गया है। ऐसे में पंचायत चुनाव बिना वैध आयोग और उसकी रिपोर्ट के कराए जाना संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ होगा। याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की थी कि सरकार को तत्काल आयोग के गठन का निर्देश दिया जाए।
इस जनहित याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में जस्टिस राजन राय और जस्टिस अवधेश चौधरी की पीठ ने सुनवाई की। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कोर्ट में एक विस्तृत हलफनामा पेश किया गया। हलफनामे में सरकार ने स्पष्ट रूप से कहा कि त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव से पहले राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया जाएगा और आयोग द्वारा दी गई रिपोर्ट के आधार पर ही पंचायत चुनाव कराए जाएंगे।
सरकारी अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन की प्रक्रिया में है और जल्द ही इसे पूरा कर लिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार संविधान और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप ही पंचायत चुनाव कराना चाहती है, ताकि भविष्य में किसी तरह का कानूनी विवाद न खड़ा हो। राज्य सरकार के इस आश्वासन के बाद हाईकोर्ट ने माना कि याचिका में अब कुछ भी शेष नहीं रह गया है और इसे निस्तारित कर दिया।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर पहले से ही चर्चाएं तेज हैं। राज्य में मौजूदा पंचायतों का कार्यकाल इस साल पूरा हो रहा है और ऐसे में अप्रैल–मई के महीने में पंचायत चुनाव कराए जाने की संभावना जताई जा रही है। सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से भी संकेत दिए जा चुके हैं कि चुनाव समय पर कराने की तैयारी की जा रही है।
इसी बीच पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर भी कई बार यह दावा कर चुके हैं कि उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव अपने तय समय पर ही कराए जाएंगे। उनका कहना रहा है कि सरकार चुनाव कराने के लिए पूरी तरह तैयार है और किसी भी संवैधानिक अड़चन को समय रहते दूर कर लिया जाएगा। हालांकि, विपक्षी दल लगातार यह सवाल उठाते रहे हैं कि बिना वैध पिछड़ा वर्ग आयोग और उसकी रिपोर्ट के पंचायत चुनाव कराना सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के खिलाफ होगा।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने पंचायत और निकाय चुनावों में OBC आरक्षण को लेकर ‘ट्रिपल टेस्ट’ फार्मूला लागू करने के निर्देश दिए हैं। इसके तहत सबसे पहले एक समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन जरूरी होता है, जो स्थानीय निकायों में पिछड़े वर्गों की स्थिति का अध्ययन कर रिपोर्ट देता है। उसी रिपोर्ट के आधार पर आरक्षण तय किया जाता है। उत्तर प्रदेश में पिछड़ा वर्ग आयोग का कार्यकाल समाप्त हो जाने के कारण यह प्रक्रिया फिलहाल अधूरी मानी जा रही थी।
ऐसे में योगी सरकार का हाईकोर्ट में दिया गया यह हलफनामा राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों ही दृष्टि से अहम माना जा रहा है। इससे एक ओर जहां पंचायत चुनाव की राह साफ होती दिख रही है, वहीं दूसरी ओर यह भी स्पष्ट हो गया है कि चुनाव से पहले आयोग की रिपोर्ट को आधार बनाया जाएगा। हालांकि, अगर आयोग के गठन और रिपोर्ट आने में देरी होती है, तो पंचायत चुनाव की समय-सीमा आगे बढ़ने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर स्थिति अब काफी हद तक स्पष्ट होती नजर आ रही है। राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन और उसकी रिपोर्ट पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि इसी के आधार पर यह तय होगा कि पंचायत चुनाव समय पर होंगे या फिर उनमें कुछ देरी देखने को मिल सकती है।
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