सिद्धांत चतुर्वेदी और मृणाल ठाकुर की दो दीवाने शहर में सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है. देखने की प्लानिंग है तो पहले इसका रिव्यू पढ़ लीजिए.
लड़का भी परफेक्ट नहीं है, लड़की भी परफेक्ट नहीं है। दोनों अपने-अपने भीतर किसी न किसी कमी से जूझ रहे हैं, अपने डर से लड़ रहे हैं। ऐसे में सवाल यही उठता है कि इश्क कैसे होगा? और अगर इश्क होगा भी, तो क्या समाज, हालात और खुद के डर उसे कबूल करने देंगे? यही सवाल इस क्यूट और बेहद रिलेटेबल लव स्टोरी की आत्मा है, जो बड़े-बड़े फिल्मी ट्विस्ट या ग्लैमरस परफेक्शन के बजाय आम जिंदगी की सच्चाइयों को सामने रखती है।

हमने अब तक ज्यादातर ऐसी लव स्टोरीज देखी हैं, जहां हीरो-हीरोइन लगभग परफेक्ट होते हैं—कॉन्फिडेंट, स्मार्ट, गुड लुकिंग और हर हाल में सही फैसला लेने वाले। लेकिन यह फिल्म उसी फॉर्मूले को तोड़ती है। यहां हीरो और हीरोइन दोनों में ही ‘ट्विस्ट’ है, और यही ट्विस्ट इस कहानी को खास, क्यूट और सबसे ज्यादा रिलेटेबल बनाता है। असल जिंदगी में भी न तो सारे लड़के परफेक्ट होते हैं और न ही सारी लड़कियां, और शायद इसी वजह से यह कहानी दिल के काफी करीब लगती है।
कहानी
कहानी शशांक की है, जिसे सब ससांक कहते हैं क्योंकि वह ‘श’ को ‘स’ बोलता है। ससांक एक ऐसा लड़का है, जिसमें टैलेंट तो है, लेकिन कॉन्फिडेंस की भारी कमी है। अगर उससे प्रेजेंटेशन देने को कह दिया जाए, तो वह नौकरी छोड़ने तक का फैसला कर सकता है। दूसरी ओर कहानी में एंट्री होती है रोशनी की, जिसे सब रोसनी कहते हैं। रोसनी मोटा सा चश्मा लगाती है और अपने लुक को लेकर पूरी तरह कंफर्टेबल है। जब कोई उससे पूछता है कि उसने कॉन्टेक्ट लेंस लगाने के बारे में क्यों नहीं सोचा, तो वह करारा जवाब देती है—“तुमने ब्रेन इंप्लांट का नहीं सोचा?”
अब सवाल यही है कि जब दोनों किरदार खुद को अधूरा मानते हैं, तो क्या उनके बीच प्यार होगा? क्या यह पहली नजर का प्यार होगा या धीरे-धीरे पनपने वाला रिश्ता? और सबसे अहम, क्या ये दोनों अपनी-अपनी कमियों और डर पर जीत पा पाएंगे? इन सवालों के जवाब जानने के लिए आपको थिएटर में जाकर फिल्म देखनी होगी।
कैसी है फिल्म
यह एक हल्की-फुल्की, फील गुड फिल्म है, जो बिना भारी-भरकम ड्रामे के बड़ी बातें कह जाती है। फिल्म हमें याद दिलाती है कि हर इंसान में कोई न कोई कमी होती है और वही कमी उसे इंसान बनाती है। यही वजह है कि दर्शक इस कहानी से आसानी से जुड़ जाते हैं। फिल्म की रफ्तार संतुलित है, बीच-बीच में गाने आते हैं जो कहानी को सांस लेने का मौका देते हैं। कोई ऐसा जबरदस्त ट्विस्ट नहीं है जो आपको चौंका दे, लेकिन छोटे-छोटे पल दिल जरूर जीत लेते हैं।
एक्टिंग
इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी परफॉर्मेंस है। सिद्धांत चतुर्वेदी ने ससांक के किरदार को जिया है। उनकी बॉडी लैंग्वेज, हिचकिचाहट और नर्वसनेस इतनी नेचुरल लगती है कि आप वाकई महसूस करते हैं कि यह लड़का कॉन्फिडेंस की कमी से जूझ रहा है। वहीं मृणाल ठाकुर रोसनी के रोल में बेहद क्यूट और असरदार लगी हैं। उनका आत्मविश्वास और सादगी किरदार को खास बनाती है।
सपोर्टिंग कास्ट में इला अरुण, संदीपा धर, आयशा रज़ा और जॉय सेनगुप्ता ने भी अपने-अपने रोल से कहानी को मजबूत किया है।
राइटिंग और डायरेक्शन
फिल्म को अभिरुचि चांद ने लिखा है और रवि उदयवार ने डायरेक्ट किया है। राइटिंग सरल, सच्ची और रिलेटेबल है, जिससे दर्शक आसानी से कनेक्ट कर पाते हैं। डायरेक्शन संतुलित है, हालांकि अगर स्क्रीनप्ले थोड़ा और टाइट होता तो फिल्म और बेहतर बन सकती थी।
कुल मिलाकर, यह फिल्म उन लोगों के लिए है जो परफेक्शन से ज्यादा अपनापन ढूंढते हैं। यह लव स्टोरी फिल्मी कम और रियल ज्यादा लगती है, और शायद यही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है।