लखनऊ की पहचान बनी बास्केट चाट, जानिए कैसे हुई शुरूआत !

लखनऊ की गलियों से निकली बास्केट चाट, स्वाद जो पीढ़ियों से ज़िंदा है

भारत अपने लज़ीज़ और विविधतापूर्ण खान-पान के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। हर शहर की अपनी एक अलग स्वाद पहचान है—कहीं हैदराबाद की दमदार बिरयानी लोगों को खींच लाती है, तो कहीं दिल्ली के छोले-भटूरे सुबह से ही भीड़ जुटा देते हैं। लेकिन जब बात चाट की आती है, तो उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का नाम खुद-ब-खुद ज़ुबान पर आ जाता है। लखनऊ सिर्फ नवाबों, तहज़ीब और अदब का शहर नहीं है, बल्कि यह उन स्वादों का शहर भी है, जो एक बार चख लेने के बाद हमेशा याद रह जाते हैं।

लखनऊ की पहचान बनी बास्केट चाट, जानिए कैसे हुई शुरूआत !
लखनऊ की पहचान बनी बास्केट चाट, जानिए कैसे हुई शुरूआत !

लखनऊ की गलियों में चलते हुए आपको हर मोड़ पर कुछ न कुछ खास खाने को मिल जाएगा—टुंडे कबाब, गलावटी कबाब, शीरमाल, कुल्फी और अनगिनत तरह की चाट। इन्हीं स्वादों के बीच एक ऐसी डिश है, जिसने बीते चार दशकों से लोगों के दिल और ज़ुबान दोनों पर राज किया है। इस डिश का नाम है बास्केट चाट। शायद बहुत से लोगों को यह नहीं पता कि लखनऊ की यह मशहूर बास्केट चाट करीब 43 साल पुरानी है और इसके पीछे एक दिलचस्प इतिहास छिपा हुआ है।

43 साल पुरानी बास्केट चाट की शुरुआत कैसे हुई?

43 साल पुरानी बास्केट चाट की शुरुआत कैसे हुई?
43 साल पुरानी बास्केट चाट की शुरुआत कैसे हुई?

लखनऊ के सबसे पॉश और मशहूर इलाके हजरतगंज में स्थित Royal Cafe वही जगह है, जहां बास्केट चाट ने पहली बार लोगों का दिल जीता। इस रेस्टोरेंट की स्थापना साल 1991 में तीन भाइयों—मुरली धर आहूजा, लखन लाल आहूजा और कन्हैया लाल आहूजा—ने की थी। शुरुआत एक छोटे से कैफे के रूप में हुई थी, लेकिन धीरे-धीरे इसका नाम पूरे लखनऊ में फैल गया।

हजरतगंज मेट्रो स्टेशन के ठीक सामने स्थित होने की वजह से रॉयल कैफे आज लखनऊ की पहचान बन चुका है। आलम यह है कि लोग रास्ता बताते वक्त भी कहते हैं—“रॉयल कैफे के सामने।” समय के साथ इस कैफे के कई आउटलेट्स खुल गए, लेकिन इसकी पहचान आज भी बास्केट चाट से ही जुड़ी हुई है।

बास्केट चाट आखिर है क्या?

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बास्केट चाट आम चाट से बिल्कुल अलग होती है। इसकी सबसे खास बात है इसे परोसने का तरीका। सबसे पहले कद्दूकस किए हुए आलू को तलकर एक छोटी सी कुरकुरी टोकरी यानी बास्केट का आकार दिया जाता है। यही आलू की टोकरी इस डिश की जान होती है।

इस कुरकुरी टोकरी के अंदर डाली जाती हैं कई स्वादों की परतें—मसालेदार छोले, आलू टिक्की, दही बड़ा, पापड़ी, मीठी और तीखी चटनी, सेव, मुरमुरे, हरी धनिया, हरी मिर्च, चाट मसाला, जीरा, अमचूर और ऊपर से ताज़े अनार के दाने। इन सबका मेल ऐसा होता है कि हर बाइट में नया स्वाद महसूस होता है।

इसका स्वाद इतना खास क्यों है?

बास्केट चाट की खासियत है गरम और ठंडी चीजों का परफेक्ट कॉम्बिनेशन। गरम आलू टिक्की और छोले के साथ ठंडा दही, ऊपर से मीठी-खट्टी चटनियां—यह सब मिलकर स्वाद का ऐसा अनुभव देते हैं, जो लंबे समय तक याद रहता है। अनार के दाने इसे न सिर्फ स्वाद में, बल्कि देखने में भी बेहद खूबसूरत बना देते हैं।

रॉयल कैफे की एक और खास परंपरा है—चाट खाने के बाद थोड़ा सा हाजमा पेस्ट देना, ताकि पाचन सही रहे। यही छोटी-छोटी बातें इस डिश को बाकी चाट से अलग और खास बनाती हैं।

कीमत और कहां मिलेगी बास्केट चाट?

कीमत और कहां मिलेगी बास्केट चाट?
कीमत और कहां मिलेगी बास्केट चाट?

आज के समय में इस मशहूर बास्केट चाट की कीमत करीब 200 रुपये के आसपास है। इसे तैयार करने में लगभग 10 मिनट लगते हैं, लेकिन इसका स्वाद आपको लंबे समय तक याद रहता है। अगर आप लखनऊ जा रहे हैं, तो हजरतगंज और अमीनाबाद में आपको बास्केट चाट आसानी से मिल जाएगी। हालांकि, रॉयल कैफे की बास्केट चाट को आज भी सबसे ज्यादा ऑथेंटिक और मशहूर माना जाता है।

अगर आप लखनऊ की असली फूड पहचान को करीब से जानना चाहते हैं, तो बास्केट चाट जरूर ट्राई करें—क्योंकि यह सिर्फ एक चाट नहीं, बल्कि 43 साल पुराने स्वाद और परंपरा की कहानी है।

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