गोंडा से अयोध्या और प्रतापगढ़ तक 3 हत्याकांड से गरमाई यूपी की सियासत, 2027 से पहले जातीय समीकरण पर बढ़ी हलचल।
उत्तर प्रदेश में गोंडा, अयोध्या और प्रतापगढ़ में हुई तीन अलग-अलग हत्याओं ने अब सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि सियासी बहस का रूप ले लिया है। इन घटनाओं को लेकर विपक्षी दल सरकार पर हमलावर हैं। वहीं, इन मामलों में मृतकों और आरोपियों की सामाजिक पृष्ठभूमि को लेकर ‘ओबीसी बनाम सवर्ण’ की बहस भी तेज होती दिखाई दे रही है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले इन घटनाओं ने यूपी की सियासत में नई हलचल पैदा कर दी है।
गोंडा में विनोद साहनी हत्याकांड से शुरू हुआ विवाद
सबसे ज्यादा राजनीतिक हलचल गोंडा के विनोद कुमार साहनी हत्याकांड को लेकर देखने को मिल रही है। परसपुर क्षेत्र में बर्तन व्यापारी विनोद साहनी पर हमला हुआ था। इलाज के दौरान लखनऊ के KGMU में उनकी मौत हो गई। घटना के बाद निषाद समुदाय में आक्रोश देखने को मिला और मामला राजनीतिक रूप से भी गरमा गया।
पुलिस ने मामले में आरोपियों को गिरफ्तार किया है। इसके साथ ही लापरवाही के आरोप में पुलिसकर्मियों पर भी कार्रवाई की गई है। एबीपी की रिपोर्ट के मुताबिक, मामले में तीन नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी के साथ थानाध्यक्ष, चौकी प्रभारी और बीट प्रभारी को निलंबित किया गया।
इस मामले को लेकर निषाद पार्टी के अध्यक्ष और यूपी सरकार में मंत्री संजय निषाद ने भी सख्त रुख अपनाया। वह लखनऊ में धरने पर बैठे और आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की। इस दौरान समाजवादी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता भी उनके समर्थन में नजर आए। वहीं अखिलेश यादव ने भी मामले को लेकर सरकार पर सवाल खड़े किए।
अयोध्या में रामलगन मौर्य की हत्या का मामला
दूसरी घटना अयोध्या से जुड़ी है। पूराकलंदर थाना क्षेत्र के कन्दैला गांव में 25 अगस्त को जमीन और रास्ते के पुराने विवाद को लेकर रामलगन मौर्य और उनकी मां पार्वती देवी पर हमला हुआ था। इस हमले में रामलगन मौर्य की मौत हो गई, जबकि उनकी मां घायल हुई थीं।
घटना के बाद विपक्षी दलों ने इसे लेकर सरकार पर निशाना साधा। मामला इसलिए भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया क्योंकि मृतक मौर्य समुदाय से जुड़े थे और आरोपियों की सामाजिक पृष्ठभूमि को लेकर भी चर्चा तेज हुई।
प्रतापगढ़ में सौरभ विश्वकर्मा हत्याकांड
तीसरा मामला प्रतापगढ़ का है, जहां कंप्यूटर ऑपरेटर सौरभ विश्वकर्मा की हत्या को लेकर राजनीतिक माहौल गर्म है। इस मामले में कई लोगों के नाम आरोपियों के तौर पर सामने आए हैं। घटना के विरोध में समाजवादी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया और पुलिस प्रशासन से कार्रवाई की मांग की। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और नेताओं के बीच बहस की स्थिति भी बनी।
तीन घटनाओं ने क्यों पकड़ा जातीय रंग?
इन तीनों मामलों को लेकर सियासी बहस का सबसे बड़ा कारण मृतकों और आरोपियों की सामाजिक पृष्ठभूमि को बताया जा रहा है। गोंडा में मृतक साहनी/मल्लाह समुदाय से, अयोध्या में रामलगन मौर्य समुदाय से और प्रतापगढ़ में सौरभ विश्वकर्मा समुदाय से जुड़े बताए जा रहे हैं।
यही वजह है कि विपक्ष इन घटनाओं को पिछड़े वर्गों की सुरक्षा और न्याय से जोड़कर सरकार को घेर रहा है। समाजवादी पार्टी अपने PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण के तहत इन मुद्दों को राजनीतिक रूप से उठा रही है।
2027 चुनाव से पहले बीजेपी के लिए चुनौती?
उत्तर प्रदेश में बीजेपी की राजनीति में गैर-यादव ओबीसी वर्ग की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही है। मौर्य, निषाद और विश्वकर्मा जैसे समुदाय चुनावी समीकरणों में अहम माने जाते हैं। ऐसे में अगर इन घटनाओं को लेकर इन समुदायों में नाराजगी बढ़ती है तो इसका असर आने वाले चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है।
दूसरी तरफ बीजेपी की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि संबंधित मामलों में पुलिस ने कार्रवाई की है और आरोपियों की गिरफ्तारी की गई है। सत्ता पक्ष विपक्ष पर अपराध की घटनाओं को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगा रहा है।
विपक्ष के हमले से बढ़ा सियासी दबाव
गोंडा मामले में तो बीजेपी की सहयोगी निषाद पार्टी के नेता संजय निषाद के खुद सरकार के तंत्र के खिलाफ मुखर होने से मामला और संवेदनशील हो गया है। विपक्षी दलों को सरकार पर हमला बोलने का मौका मिला है।
अब सवाल सिर्फ तीन हत्याकांड की जांच और आरोपियों पर कार्रवाई का नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या इन घटनाओं का असर यूपी के सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों पर पड़ेगा? क्या विपक्ष इन मामलों को 2027 के चुनाव में बड़ा मुद्दा बना पाएगा? और क्या बीजेपी अपने गैर-यादव ओबीसी वोट बैंक के बीच उठ रही नाराजगी को समय रहते संभाल पाएगी?
फिलहाल पुलिस की कार्रवाई और राजनीतिक बयानबाजी दोनों जारी हैं। आने वाले दिनों में इन तीनों मामलों में जांच की दिशा और सरकार की कार्रवाई पर सभी की नजर रहेगी।