सारा विवाद तब शुरू हुआ जब शशि थरूर ने प्रधानमंत्री मोदी के रामनाथ गोयनका लेक्चर की खुलकर तारीफ की. संदीप दीक्षित और सुप्रिया श्रीनेत ने शशि थरूर पर निशाना साधा.
कांग्रेस सांसद शशि थरूर द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया रामनाथ गोयनका लेक्चर की सार्वजनिक सराहना करना पार्टी के भीतर एक बड़े राजनीतिक विवाद में बदल गया है। थरूर की इस टिप्पणी ने न केवल सोशल मीडिया पर चर्चा को जन्म दिया, बल्कि कांग्रेस के भीतर तीखी प्रतिक्रियाओं की लहर भी पैदा कर दी है। कई वरिष्ठ नेताओं ने थरूर को पार्टी लाइन से हटकर बयान देने पर घेरा है, वहीं कुछ नेताओं ने इसे “अनुशासनहीनता” तक करार दिया है।

थरूर ने क्या कहा था?
दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रामनाथ गोयनका व्याख्यान में मीडिया की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रीय प्रगति में पत्रकारिता की भूमिका को लेकर संबोधन दिया था। थरूर ने इस लेक्चर की प्रशंसा करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा कि प्रधानमंत्री ने “उत्कृष्ट और विचारोत्तेजक भाषण” दिया है, जिसमें मीडिया और सरकार के रिश्तों पर महत्वपूर्ण संदेश निहित हैं। थरूर के अनुसार यह भाषण “लोकतांत्रिक विमर्श को मजबूत करता है और संवाद की दिशा तय करता है।”
यही टिप्पणी कांग्रेस नेताओं के गले नहीं उतरी।
कांग्रेस में फूटा गुस्सा
कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने थरूर के बयान को पार्टी लाइन से विचलन माना। इन नेताओं का तर्क है कि ऐसे समय में जब पार्टी लगातार बीजेपी की नीतियों और प्रधानमंत्री मोदी की शैली को लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए खतरा बता रही है, थरूर का ऐसा बयान भ्रम पैदा कर सकता है।
सबसे तीखी प्रतिक्रिया कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित की रही, जिन्होंने खुले तौर पर थरूर की मंशा पर सवाल उठा दिए। दीक्षित ने कहा:
“अगर शशि थरूर को लगता है कि बीजेपी बेहतर है और पीएम मोदी का नेतृत्व श्रेष्ठ है, तो फिर वे कांग्रेस में क्यों बने हुए हैं? उन्हें अपनी राजनीतिक विचारधारा स्पष्ट करनी चाहिए।”
उन्होंने आगे कहा कि पार्टी अनुशासन का पालन करना हर सांसद की जिम्मेदारी है और वरिष्ठ नेताओं को अपनी राय व्यक्त करते समय पार्टी की विचारधारा का ध्यान रखना चाहिए।
अन्य नेताओं की प्रतिक्रियाएँ
कई अन्य नेताओं ने भी थरूर के बयान का विरोध किया। इनमें कुछ राज्यस्तरीय नेताओं ने कहा कि इस तरह की प्रशंसा “पार्टी की संघर्षशील छवि को कमजोर करती है।” एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “थरूर का ये स्वभाव नया नहीं है। वे अक्सर ऐसी टिप्पणियाँ करते हैं जो पार्टी नेतृत्व को असहज करती हैं।”
दूसरी ओर, कुछ नेताओं ने थरूर का बचाव भी किया और कहा कि राजनीति में विचारों की विविधता गलत नहीं है, और किसी प्रतिद्वंद्वी के अच्छे काम की सराहना करना परिपक्व लोकतंत्र का हिस्सा है।
थरूर ने दिया स्पष्टीकरण
लगातार बढ़ रही आलोचना के बीच शशि थरूर ने सफाई भी दी। उन्होंने कहा कि उनकी टिप्पणी बीजेपी या मोदी सरकार की नीतियों का समर्थन नहीं थी, बल्कि व्याख्यान की गुणवत्ता और उसमें कही गई बातों की सराहना थी। थरूर ने दोहराया कि वे कांग्रेस की विचारधारा और मूल्यों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।
थरूर ने यह भी कहा कि:
“किसी भी राजनीतिक या वैचारिक मतभेद के बावजूद, अच्छे विचारों की सराहना करना राजनीतिक शिष्टाचार का हिस्सा है। इससे मेरी पार्टी निष्ठा पर कोई प्रश्न नहीं उठता।”
कांग्रेस नेतृत्व की तटस्थ प्रतिक्रिया
कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने इस विवाद पर अब तक आधिकारिक रूप से सीधी टिप्पणी नहीं की है, लेकिन पार्टी सूत्रों के अनुसार, हाईकमान इस पर करीब से नजर बनाए हुए है। कुछ सूत्रों का कहना है कि पार्टी भविष्य में ऐसे विवादों को रोकने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने पर विचार कर सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विश्लेषकों का मत है कि यह विवाद कांग्रेस के भीतर विचारधारा और रणनीति को लेकर जारी अंतर्कलह का एक और उदाहरण है। पार्टी के भीतर कई नेता उदारवादी दृष्टिकोण का समर्थन करते हैं, जबकि अन्य इसे चुनावी राजनीति के लिए नुकसानदायक मानते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह विवाद कांग्रेस की एकता और जनसंदेश को कमजोर कर सकता है, खासकर ऐसे समय में जब पार्टी खुद को बीजेपी के सामने एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है।
निष्कर्ष
शशि थरूर की एक साधारण-सी टिप्पणी ने कांग्रेस के भीतर खींचतान को फिर से उजागर कर दिया है। यह विवाद सिर्फ एक टिप्पणी का नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर वैचारिक संतुलन की जद्दोजहद का प्रतीक भी है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि हाईकमान इस पूरे मामले को किस तरह संभालता है और थरूर की भूमिका पार्टी में आगे कैसा मोड़ लेती है।