नीतीश कैबिनेट के 26 मंत्रियों ने 20 नवंबर को शपथ ली। इसमें एक नाम दीपक प्रकाश काफी चर्चा में रहा क्योंकि वह ना ही विधायक हैं और ना ही एमएलसी हैं।
बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की ऐतिहासिक जीत के बाद 20 नवंबर को नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक करियर का एक और महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ते हुए 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। राजभवन में हुए इस भव्य समारोह में कुल 26 मंत्रियों ने भी शपथ ली। लेकिन इनमें सबसे ज्यादा चर्चा जिस नाम की हुई, वह है दीपक प्रकाश—जो न विधायक हैं, न ही विधान परिषद के सदस्य। इसके बावजूद उन्हें मंत्रिपरिषद में जगह मिली और यह फैसला राजनीतिक गलियारों में कई तरह के संदेश देता दिख रहा है।

कौन हैं दीपक प्रकाश?
दीपक प्रकाश एनडीए के घटक दल राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) से आते हैं। यह पार्टी उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व में बिहार की राजनीति में सक्रिय है और हालिया चुनाव में एनडीए गठबंधन का हिस्सा बनकर मैदान में उतरी थी। हालांकि RLM का प्रदर्शन चुनाव में खास नहीं रहा, लेकिन रणनीतिक दृष्टि से एनडीए ने इस दल को सरकार में प्रतिनिधित्व देकर एक महत्त्वपूर्ण संकेत दिया है।

दीपक प्रकाश पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में एक मजबूत चेहरा माने जाते हैं और लंबे समय से कुशवाहा के विश्वसनीय सहयोगी रहे हैं। पार्टी में उनकी पकड़, जातीय समीकरणों में उनकी उपयोगिता और संगठन को मजबूत करने की उनकी क्षमता को देखते हुए उन्हें सरकार में शामिल किया गया है।
विधायक या एमएलसी न होते हुए भी मंत्री कैसे बन सकते हैं?
संविधान के अनुसार, कोई भी व्यक्ति विधायक या एमएलसी न होते हुए भी मंत्री बन सकता है, लेकिन उसे छह महीनों के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना अनिवार्य होता है। दीपक प्रकाश को इसी संवैधानिक प्रावधान के तहत मंत्री पद दिलाया गया है।
नीतीश सरकार के भीतर यह कोई नई मिसाल नहीं है। पहले भी कई बार तकनीकी या राजनीतिक कारणों से गैर-सांसद नेताओं को मंत्री बनाया जाता रहा है और बाद में उपचुनाव या विधान परिषद में नामांकन के माध्यम से उन्हें सदस्यता दिलाई जाती रही है।
क्यों खास है दीपक प्रकाश की ताजपोशी?
- RLM को मजबूत प्रतिनिधित्व
चुनाव के बाद जितनी सीटें मिलीं, उस अनुपात से मंत्रिमंडल में जगह मिलना आसान नहीं होता। लेकिन RLM कोटे से दीपक प्रकाश को शामिल कर एनडीए ने उपेंद्र कुशवाहा को महत्वपूर्ण राजनीतिक सम्मान दिया है। - कुशवाहा समीकरण साधने का प्रयास
बिहार की राजनीति में कुशवाहा समुदाय हमेशा निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। दीपक प्रकाश को मंत्री बनाना इस वर्ग में राजनीतिक संदेश भेजने और एनडीए की पकड़ बनाए रखने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। - नीतीश-उपेंद्र समीकरण की मजबूती
पिछले वर्षों में उपेंद्र कुशवाहा की राजनीतिक यात्रा उतार-चढ़ाव भरी रही है। कभी एनडीए में, कभी उसके बाहर। लेकिन इस बार की चुनावी सफलता के बाद नीतीश कुमार ने उन्हें स्पष्ट राजनीतिक सम्मान दिया है।
शपथ समारोह में क्यों रहे चर्चा का केंद्र?
शपथ ग्रहण समारोह के दौरान कई बड़े चेहरे मौजूद थे, लेकिन जिस क्षण दीपक प्रकाश ने मंत्री पद की शपथ ली, कैमरों की नजरें उन पर टिक गईं। राजनीति के जानकार कह रहे हैं कि
- यह फैसला एनडीए में ताकत का संतुलन बनाए रखने का संकेत है,
- साथ ही नीतीश कुमार का छोटे दलों को भी बराबरी का स्पेस देने का फार्मूला एक बार फिर सामने आया है।
आगे की राह
मंत्री बनने के बाद दीपक प्रकाश के सामने कई चुनौतियाँ होंगी—
- प्रशासनिक अनुभव को तुरंत मजबूत करना,
- अपनी मंत्रालय की प्राथमिकताओं को तेज़ी से सेट करना,
- और छह महीनों के भीतर सदन की सदस्यता हासिल करना।
यह भी माना जा रहा है कि उन्हें जल्द ही विधान परिषद भेजे जाने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
उधर, RLM के कार्यकर्ताओं में उनके शपथ ग्रहण को लेकर जोश देखने को मिल रहा है और इसे पार्टी के विस्तार के लिए बड़ा अवसर माना जा रहा है।
निष्कर्ष
दीपक प्रकाश का मंत्री बनना बिहार की राजनीति में एक बार फिर साबित करता है कि सत्ता के समीकरण सिर्फ चुनावी आंकड़ों से तय नहीं होते, बल्कि राजनीतिक रणनीति, सामाजिक संतुलन और गठबंधन प्रबंधन जैसे कारक भी उसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अब सबकी निगाहें इस बात पर होंगी कि नया मंत्री अपनी जिम्मेदारियों को किस तरह निभाते हैं और एनडीए सरकार में उनका योगदान कितना प्रभावशाली साबित होता है।