“राम ध्वजारोहण से दूर रखे जाने पर भड़के सपा सांसद”

सपा सांसद अवधेश प्रसाद ने कहा कि बीजेपी ने जैसे अयोध्या की जनता का अनादर किया है, इस आयोजन में नहीं बुलाया है, इसका सबक भाजपा को जरूर मिलेगा.

अयोध्या में राम मंदिर के ध्वजारोहण समारोह को लेकर सियासी तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। फैजाबाद लोकसभा क्षेत्र से समाजवादी पार्टी (सपा) के सांसद अवधेश प्रसाद को इस ऐतिहासिक कार्यक्रम के लिए निमंत्रण नहीं भेजा गया, जिसके बाद उन्होंने इसे अयोध्या की जनता का “अनादर” बताया। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि व्यक्तिगत तौर पर उन्हें इससे कोई दुःख नहीं है, लेकिन स्थानीय लोग इस बात से क्षुब्ध हैं कि उनके चुने हुए जनप्रतिनिधि को समारोह से बाहर रखा गया।

"राम ध्वजारोहण से दूर रखे जाने पर भड़के सपा सांसद"
“राम ध्वजारोहण से दूर रखे जाने पर भड़के सपा सांसद”

सपा सांसद का बयान: ‘मेरी नहीं, अयोध्या वासियों की बेइज्जती’

अखिलेश यादव के चचेरे भाई की शादी में शामिल होने के लिए सफाई पहुंचे सांसद अवधेश प्रसाद ने एबीपी न्यूज़ से बात की। उन्होंने कहा कि वह लंबे समय से इस बात का इंतज़ार कर रहे थे कि राम मंदिर धर्म ध्वजा आयोजन के लिए उन्हें भी निमंत्रण मिलेगा। उन्होंने कहा कि एक जनप्रतिनिधि होने के नाते यह उम्मीद स्वाभाविक थी, लेकिन बिना किसी कारण उन्हें नजरअंदाज किया गया।

सपा सांसद का बयान: ‘मेरी नहीं, अयोध्या वासियों की बेइज्जती’
सपा सांसद का बयान: ‘मेरी नहीं, अयोध्या वासियों की बेइज्जती’

सांसद ने कहा,
“मुझे इससे कोई तकलीफ नहीं है। मैं साधारण आदमी हूँ, लेकिन अयोध्या की जनता इसे अपना अपमान मान रही है। उन्हें लगता है कि उनके प्रतिनिधि को बुलाए बिना आयोजन अधूरा रह गया। इतने बड़े कार्यक्रम में जनता की आवाज़ को प्रतिनिधित्व देने का यह मौका गंवा दिया गया।”

अवधेश प्रसाद ने जोर देकर कहा कि किसी भी बड़े आयोजन में चुने हुए जनप्रतिनिधियों को बुलाना लोकतांत्रिक मर्यादा का हिस्सा है। “यह व्यक्तिगत मामला नहीं है, यह अयोध्या और फैजाबाद के लोगों का सम्मान जुड़ा हुआ मुद्दा है।”

राजनीतिक हलकों में चर्चा, विपक्ष का निशाना

इस मामले ने सियासी गलियारों में भी बहस तेज कर दी है। विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि बीजेपी सरकार लगातार राजनीतिक भेदभाव के आधार पर निमंत्रण बांट रही है और जनप्रतिनिधियों को पार्टी लाइन पर तौल रही है। सपा नेताओं ने कहा कि लोकतांत्रिक ढांचे में चुने हुए जनप्रतिनिधियों का सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए, चाहे वे किसी भी पार्टी से हों।

पार्टी के कई नेताओं का कहना है कि भाजपा सरकार अयोध्या को राजनीतिक केंद्र बनाने में जुटी है और इसी वजह से विपक्षी नेताओं को समारोहों से दूर रखा जा रहा है। सपा इसे “राजनैतिक संकीर्णता” का उदाहरण बता रही है।

सरकार और मंदिर ट्रस्ट की चुप्पी

अब तक न तो उत्तर प्रदेश सरकार और न ही श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की ओर से इस मामले में औपचारिक बयान आया है कि आखिर सांसद को क्यों नहीं बुलाया गया। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ऐसे आयोजनों की सूची आम तौर पर प्रशासन और ट्रस्ट मिलकर तैयार करते हैं। इस घटनाक्रम ने दोनों के बीच समन्वय को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

अयोध्या की जनता की प्रतिक्रिया

स्थानीय लोगों में भी इस मुद्दे को लेकर चर्चा तेज है। क्षेत्र के कई निवासियों ने कहा कि संसद में उनकी आवाज़ उठाने वाला व्यक्ति जब किसी बड़े सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजन से बाहर रखा जाता है, तो स्वाभाविक रूप से लोग इसे अपना अपमान समझते हैं। राम मंदिर निर्माण को लेकर पूरे क्षेत्र में उत्साह रहा है, ऐसे में कई लोगों का मानना है कि यह समारोह हर वर्ग और हर प्रतिनिधि के लिए खुला होना चाहिए था।

अवधेश प्रसाद का सियासी संदेश

सपा सांसद ने बातचीत के दौरान यह भी कहा कि वे राम के भक्त हैं और राजनीति को भक्ति के आड़े नहीं आने देते। उन्होंने कहा कि यदि उन्हें बुलाया जाता तो वे खुशी-खुशी आयोजन में जाते और वहां उपस्थित होकर अयोध्या की जनता की ओर से श्रद्धा व्यक्त करते।
उन्होंने कहा,
“आम जनता को जोड़ने वाले कार्यक्रम को राजनीति से दूर रखना चाहिए। चाहे कोई किसी भी पार्टी का हो, अयोध्या सबकी है और राम सबके हैं।”

आगे क्या?

इस विवाद ने न केवल सपा और भाजपा के बीच खींचतान को और बढ़ा दिया है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि धार्मिक आयोजनों में राजनीतिक चयन क्या सही है। आगामी दिनों में यह मुद्दा और भी तूल पकड़ सकता है, क्योंकि विपक्ष इसे “लोकतांत्रिक उपेक्षा” बताकर सरकार को घेरने का मौका समझ रहा है।

राम मंदिर और उससे जुड़े आयोजनों पर पहले भी राजनीति होती रही है, और यह घटना एक बार फिर राजनीतिक दलों को आमने-सामने लाकर खड़ा कर रही है। जनता और राजनीतिक विश्लेषकों की नजर अब सरकार और मंदिर ट्रस्ट की ओर से आने वाली स्पष्ट प्रतिक्रिया पर टिकी है।

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