आदेश पशु कल्याण अधिकारी डॉक्टर संतोष पाल द्वारा दिया गया था. इस दिन को अहिंसा दिवस के रूप में मनाए जाने को लेकर पशु वध को पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया था.
उत्तर प्रदेश में नवरात्रि, सावन और अन्य धार्मिक पर्वों के दौरान मीट-मछली की दुकानों का बंद रहना आम बात है। लेकिन वाराणसी में मंगलवार, 25 नवंबर को मीट और मछली की दुकानों के बंद रहने का कारण इस बार अलग था। वाराणसी नगर निगम ने साधू टी. एल. वासवानी के जन्मदिन के अवसर पर पूरे नगर निगम क्षेत्र में मीट-मछली की बिक्री पर एक दिन के लिए प्रतिबंध लगाया। इस आदेश के चलते शहर की सभी मीट की दुकानें दिनभर पूरी तरह बंद रहीं।

कौन थे साधू टी. एल. वासवानी?
साधू थारूमल लक्ष्मणरायन वासवानी एक प्रसिद्ध आध्यात्मिक नेता, शिक्षाविद और अहिंसा के समर्थक थे। उनका जन्मदिन कई स्थानों पर “अहिंसा दिवस” के रूप में मनाया जाता है। वे पशु-प्रेम, करुणा और शाकाहार के समर्थक माने जाते हैं। अहिंसा के प्रति उनके समर्पण के कारण देशभर में कई समुदाय इस दिन मीट-मछली की बिक्री और उपभोग पर रोक लगाकर श्रद्धांजलि देते हैं।
इसी परंपरा के तहत वाराणसी में भी यह व्यवस्था वर्षों से चली आ रही है।
नगर निगम ने क्यों लगाया एक दिन का प्रतिबंध?
नगर निगम अधिकारियों के अनुसार, 25 नवंबर को साधू टी. एल. वासवानी के जन्मदिवस पर मीट-मछली की दुकानों को बंद रखने की परंपरा काफी समय पहले शुरू हुई थी। यह निर्णय हर साल एक प्रशासनिक आदेश के रूप में दोहराया जाता है।

अधिकारियों ने बताया कि यह पहल अहिंसा और पशु-सुरक्षा को सम्मान देने के उद्देश्य से की जाती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह किसी धार्मिक गतिविधि से जुड़ा आदेश नहीं है, बल्कि “अहिंसा दिवस” की परंपरा को कायम रखने के लिए उठाया गया कदम है।
बंद रहीं सभी दुकानें, बाजारों में सन्नाटा
वाराणसी के प्रमुख इलाकों—गोदौलिया, कैंट, सिगरा, लहुराबीर, भेलूपुर, और आदमपुर—में मीट और मछली की दुकानों पर ताले लटके नज़र आए। सुबह से लेकर देर रात तक शहर में कोई भी मीट शॉप नहीं खुली।
नगर निगम की टीमें सुबह से ही भ्रमण पर थीं और दुकानदारों को आदेश का पालन सुनिश्चित करने को कहा गया था। अधिकांश दुकानदारों ने कहा कि वे इस परंपरा से परिचित हैं, इसलिए हर साल की तरह इस बार भी दुकानें बंद रखीं।
एक स्थानीय दुकानदार ने बताया,
“यह आदेश कई सालों से लागू होता है। यह सिर्फ एक दिन का प्रतिबंध होता है, इसलिए हमें कोई दिक्कत नहीं होती। हम इस दिन दुकानें स्वतः बंद रखते हैं।”
स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं की प्रतिक्रिया
स्थानीय नागरिकों में इस आदेश के प्रति मिले-जुले भाव थे। कई लोगों ने इसे अहिंसा और शांति के संदेश से जोड़कर सकारात्मक माना, वहीं कुछ लोगों का कहना था कि इस तरह के आदेशों के बारे में पहले से सूचना देनी चाहिए जिससे लोग अपनी खरीददारी पहले ही कर सकें।
कुछ रेस्टोरेंट संचालक भी प्रभावित हुए, क्योंकि मीट-आधारित व्यंजन बनाने वाले कई प्रतिष्ठानों को उस दिन मेन्यू सीमित रखना पड़ा। हालांकि, अधिकांश प्रतिष्ठान पहले से आदेश की जानकारी होने के कारण तैयार थे।
वाराणसी की परंपरा और प्रशासन की भूमिका
वाराणसी, जिसकी पहचान धार्मिक परंपराओं, आध्यात्मिक गतिविधियों और सांस्कृतिक विविधता से है, अक्सर ऐसे अवसरों पर विशेष निर्देश जारी करता है। नगर निगम का कहना है कि यह आदेश सिर्फ परंपरा का हिस्सा है और इसे सामाजिक सद्भाव और अहिंसा के संदेश को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लागू किया जाता है।
अधिकारियों ने यह भी बताया कि इस परंपरा के कारण प्रशासन और दुकानदारों के बीच वर्षों से सामंजस्य बना हुआ है, जिससे किसी प्रकार की शिकायत या विरोध की स्थिति लगभग नहीं बनती।
क्या यह प्रतिबंध आगे भी जारी रहेगा?
अधिकारियों ने संकेत दिया कि आगामी वर्षों में भी यह निर्देश लागू किया जा सकता है, क्योंकि यह कई दशकों से चली आ रही व्यवस्था है। हालांकि यह स्थायी प्रतिबंध नहीं है, बल्कि हर वर्ष सिर्फ एक दिन के लिए लागू होता है।
निष्कर्ष
25 नवंबर को वाराणसी में मीट-मछली की दुकानों का बंद रहना केवल धार्मिक या प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि अहिंसा के संदेश से जुड़ी एक पुरानी परंपरा का सम्मान है। साधू टी. एल. वासवानी की करुणा और पशु-प्रेम की विचारधारा को याद करते हुए नगर निगम ने शहरभर में यह निर्देश लागू करवाया। दुकानदारों और नागरिकों ने भी इस परंपरा का पालन करते हुए शांतिपूर्ण ढंग से आदेश का स्वागत किया।