प्रियंका चतुर्वेदी ने दावा किया कि यूपी सरकार के दबाव पर चुनाव आयोग ने SIR की समयसीमा बढ़ाई है. साथ ही इंडिगो संकट पर भी सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठाए.
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) की राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने शुक्रवार (12 दिसंबर) को आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश सरकार के दबाव और अनुरोध पर एसआईआर (State Information Report) प्रक्रिया की समयसीमा बढ़ाई है। उन्होंने कहा कि यह फैसला न केवल सवाल पैदा करता है, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी संदेह खड़ा करता है। चतुर्वेदी ने यह भी स्पष्ट किया कि एसआईआर प्रक्रिया का जल्द और निष्पक्ष रूप से पूरा होना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के लिए आवश्यक है, ताकि किसी भी राजनीतिक दल—विशेषकर सत्ता पक्ष—के पक्ष में पक्षपात की गुंजाइश न रहे।

प्रियंका चतुर्वेदी ने अपने बयान में कहा कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को स्वतंत्र रूप से काम करना चाहिए और यदि वह किसी सरकार के अनुरोध पर समयसीमा बढ़ाती है तो यह बेहद गंभीर है। उन्होंने आरोप लगाया कि यूपी सरकार एसआईआर प्रक्रिया पर प्रभाव डालने की कोशिश कर रही है, ताकि भाजपा को राजनीतिक लाभ मिले। उनके मुताबिक, यह स्थिति न केवल लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करती है, बल्कि जनता के भरोसे को भी चोट पहुंचाती है।
उन्होंने यह भी कहा कि एसआईआर, यानी State Information Report, चुनावी प्रबंधन और सूचनाओं के सत्यापन से जुड़ी अहम प्रक्रिया है। इसकी कोई भी देरी या बदलाव चुनावी समय के लिहाज से बड़ा प्रभाव डाल सकती है। ऐसे में, उन्होंने चुनाव आयोग से अपील की कि वह इस प्रक्रिया को पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाए, चाहे किसी भी पक्ष से कितना ही दबाव क्यों न हो।
प्रियंका चतुर्वेदी ने इस मुद्दे को लेकर सोशल मीडिया पर भी अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने पोस्ट करते हुए लिखा कि जब भी राजनीतिक दबाव में निर्णय लिए जाते हैं, तब लोकतंत्र कमजोर होता है। उनका कहना था कि किसी राजनीतिक दल की सुविधा को ध्यान में रखकर समय सीमा बढ़ाना चुनावों की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाता है।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि चुनाव आयोग को देश का सबसे शक्तिशाली और स्वतंत्र चुनावी संस्थान माना जाता है। ऐसे में यदि कोई सरकार उस पर प्रभाव डाल रही है, तो यह बेहद खतरनाक संकेत है। लोकतांत्रिक ढांचे में विश्वास बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि चुनाव आयोग अपनी कार्यशैली को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करे और यह भी बताए कि समयसीमा बढ़ाने का आधार क्या था।
उधर, विपक्षी दलों ने भी प्रियंका चतुर्वेदी के आरोपों का समर्थन किया है। सपा, कांग्रेस और टीएमसी के कुछ नेताओं ने भी सवाल उठाए कि आखिर यूपी सरकार ने समयसीमा बढ़ाने का अनुरोध क्यों किया? क्या राज्य सरकार चुनाव से पहले प्रशासनिक या राजनीतिक तैयारी पूरी नहीं कर पा रही है? कई विपक्षी नेताओं ने इसे भाजपा के हित में उठाया गया ‘सुविधाजनक कदम’ बताया।
वहीं, भाजपा नेताओं का कहना है कि विपक्ष अनावश्यक रूप से मुद्दे को तूल दे रहा है। उनका दावा है कि समयसीमा बढ़ाना एक प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसका कोई राजनीतिक मतलब निकालना गलत है। भाजपा नेताओं के मुताबिक, एसआईआर प्रक्रिया का विस्तार इसलिए किया गया ताकि अधिक सटीकता और व्यापकता के साथ सूचनाओं का सत्यापन हो सके। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष चुनाव आयोग पर बेबुनियाद आरोप लगाकर उसकी विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहा है।
इस विवाद के बीच राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। एक ओर विपक्ष इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव का मामला बताकर भाजपा को घेरने में जुटा है, वहीं भाजपा इसे विपक्ष की ‘चुनावी बौखलाहट’ और ‘नैरेटिव सेट करने की कोशिश’ बताकर खारिज कर रही है। चुनाव आयोग की ओर से इस मुद्दे पर आधिकारिक प्रतिक्रिया आना अभी बाकी है, लेकिन राजनीतिक हलकों में इस पर चर्चा तेज हो गई है।
कुल मिलाकर, एसआईआर प्रक्रिया की समयसीमा बढ़ने से शुरू हुआ विवाद अब सत्ता और विपक्ष के बीच एक बड़े राजनीतिक विमर्श में बदलता दिख रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि चुनाव आयोग इस पर अपनी स्थिति स्पष्ट करता है या नहीं, और क्या यह विवाद आने वाले चुनावी माहौल को प्रभावित करेगा।
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