जी राम जी बिल पर सियासी घमासान, अखिलेश ने कसा तंज !

 सपा सांसद अखिलेश यादव ने कहा कि ‘जी राम जी’, बस नाम बदला गया है. इससे किसान को कोई खास लाभ नहीं मिलने जा रहा है. ना बड़ा रोजगार मिलने जा रहा है.

लोकसभा में मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) की जगह नया कानून “विकसित भारत– रोजगार एवं आजीविका गारंटी मिशन अधिनियम” पेश किए जाने के बाद सियासी घमासान तेज हो गया है। विपक्ष ने इस कदम को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला और सदन में जमकर हंगामा किया। खासतौर पर योजना से महात्मा गांधी का नाम हटाए जाने को लेकर विपक्षी दलों में भारी नाराजगी देखने को मिली।

जी राम जी बिल पर सियासी घमासान, अखिलेश ने कसा तंज !
जी राम जी बिल पर सियासी घमासान, अखिलेश ने कसा तंज !

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और सांसद अखिलेश यादव ने इस मुद्दे पर सरकार को सीधे निशाने पर लिया। उन्होंने इसे विकास से ज्यादा नाम बदलने की राजनीति करार दिया। अखिलेश यादव ने कहा कि सरकार ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उसे योजनाओं की आत्मा सुधारने से ज्यादा उनके नाम बदलने में दिलचस्पी है। उनका आरोप है कि नई योजना में न तो किसानों को कोई बड़ा लाभ मिलने वाला है और न ही ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की स्थिति में कोई ठोस सुधार होगा।

अखिलेश यादव ने एबीपी न्यूज़ से बातचीत में कहा,

“ये बस ‘जी राम जी’ है, सिर्फ नाम बदला गया है। योजना की सोच और ज़मीन पर असर वही पुराना रहने वाला है। सरकार नाम बदलकर यह दिखाना चाहती है कि कुछ नया कर रही है, जबकि हकीकत में किसान और मजदूर को कुछ खास मिलने वाला नहीं है।”

उन्होंने आगे कहा कि यह पहली बार नहीं है जब सरकार ने किसी योजना का नाम बदलकर उसे नई उपलब्धि की तरह पेश किया हो। अखिलेश ने तंज कसते हुए कहा,

“जो तरीका यूपी में नाम बदलने का अपनाया गया था, अब वही तरीका दिल्ली में भी आ गया है।”

सपा अध्यक्ष ने महात्मा गांधी का नाम हटाए जाने पर विशेष आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि मनरेगा सिर्फ एक रोजगार योजना नहीं थी, बल्कि यह ग्रामीण गरीबों के लिए सामाजिक सुरक्षा की गारंटी थी, जिसे गांधीजी के विचारों से जोड़कर देखा जाता था। उनका कहना है कि गांधी का नाम हटाना सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि विचारधारा से जुड़ा कदम है।

विपक्ष का आरोप है कि सरकार लगातार उन योजनाओं और संस्थानों से महात्मा गांधी का नाम हटाने की कोशिश कर रही है, जो सामाजिक न्याय और गरीबों के अधिकारों से जुड़ी हैं। कांग्रेस, सपा और अन्य विपक्षी दलों ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला बताया है।

वहीं सरकार की ओर से कहा गया है कि नया कानून “विकसित भारत” के विज़न के अनुरूप तैयार किया गया है और इसका उद्देश्य रोजगार के साथ-साथ आजीविका के नए अवसर पैदा करना है। सरकार का दावा है कि यह मिशन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में अहम भूमिका निभाएगा। हालांकि विपक्ष इन दावों को खोखला और भ्रामक बता रहा है।

अखिलेश यादव ने सवाल उठाया कि अगर सरकार सच में रोजगार बढ़ाना चाहती है, तो वह पहले से चल रही मनरेगा योजना के बजट और काम के दिनों को क्यों कम कर रही है। उन्होंने कहा कि जमीनी हकीकत यह है कि गांवों में मजदूरों को पूरा काम नहीं मिल रहा, भुगतान में देरी हो रही है और नई योजना से इन समस्याओं का कोई ठोस समाधान नजर नहीं आता।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद सिर्फ एक कानून का नहीं, बल्कि नाम, पहचान और विचारधारा की राजनीति से जुड़ा हुआ है। मनरेगा का नाम बदलना विपक्ष को सरकार पर हमला करने का बड़ा मुद्दा दे रहा है, खासकर ऐसे समय में जब बेरोजगारी और महंगाई पहले से ही बड़ा सवाल बनी हुई है।

कुल मिलाकर, विकसित भारत– रोजगार एवं आजीविका गारंटी मिशन अधिनियम को लेकर संसद से लेकर सड़क तक बहस तेज होती दिख रही है। अखिलेश यादव का यह बयान कि “यूपी वाला नाम बदलने का तरीका अब दिल्ली में भी आ गया है” आने वाले दिनों में सियासी बहस को और धार देने वाला माना जा रहा है।

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