पटना में आयोजित नियुक्ति पत्र वितरण समारोह के दौरान एक महिला चिकित्सक का हिजाब हटाने के प्रयास का मामला अब बिहार की राजनीति में बड़े विवाद का रूप ले चुका है। इस घटना को लेकर जहां विपक्षी दल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर तीखा हमला कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी (BJP) खुलकर उनके समर्थन में उतर आई है। इस मुद्दे ने न केवल राज्य की सियासत को गरमा दिया है, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता, महिला अधिकार और संवैधानिक मूल्यों को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है।

क्या है पूरा मामला
हाल ही में पटना में एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान नियुक्ति पत्र वितरित किए जा रहे थे। इसी कार्यक्रम में एक महिला डॉक्टर हिजाब पहनकर मंच पर पहुंचीं। आरोप है कि इस दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उनसे हिजाब हटाने को कहा और कथित तौर पर उसे हटाने का प्रयास भी किया। घटना का वीडियो और तस्वीरें सामने आने के बाद यह मामला तेजी से राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बन गया।
विपक्ष का हमला
घटना के बाद विपक्षी दलों ने नीतीश कुमार पर संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन का आरोप लगाया। विपक्ष का कहना है कि किसी भी नागरिक को अपने धर्म और पहनावे की स्वतंत्रता है, जिसे सार्वजनिक मंच पर चुनौती देना गलत है। विपक्षी नेताओं ने मुख्यमंत्री से माफी की मांग करते हुए इसे महिलाओं के सम्मान से जुड़ा मुद्दा बताया।
BJP का समर्थन और तीखा बयान
जहां विपक्ष माफी की मांग पर अड़ा है, वहीं बीजेपी ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का खुलकर समर्थन किया है। बीजेपी के वरिष्ठ नेता हरिभूषण ठाकुर बचौल ने गुरुवार, 18 दिसंबर 2025, को इस मुद्दे पर बेहद विवादित बयान दिया।
बचौल ने कहा कि पूरे भारत में हिजाब पर बैन लगना चाहिए और सार्वजनिक स्थानों व सरकारी नौकरियों में हिजाब की अनुमति नहीं होनी चाहिए। उन्होंने दावा किया कि “हिजाब की आड़ में आतंकवाद पनपता है” और कहा कि आतंकी घटनाओं के बाद अपराधी हिजाब पहनकर फरार हो जाते हैं।
‘हिजाब हटाकर नीतीश ने ठीक किया’
हरिभूषण ठाकुर बचौल ने यह भी कहा कि नियुक्ति पत्र वितरण समारोह में महिला डॉक्टर का हिजाब हटाकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने “ठीक किया”। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि नीतीश कुमार इस मामले में माफी नहीं मांगेंगे और वे पूरी तरह स्वस्थ और सक्षम हैं।

बीजेपी नेता ने यह तक कह दिया कि “जिसे हिजाब पहनना है, वह पाकिस्तान चला जाए” और महिला डॉक्टर को बिहार छोड़ देने जैसी टिप्पणी भी की। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर विवाद और गहरा गया है।
बयान पर बढ़ा विवाद
बचौल के इस बयान की व्यापक आलोचना हो रही है। विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने इसे भड़काऊ और विभाजनकारी बताया है। उनका कहना है कि इस तरह के बयान न केवल सामाजिक सौहार्द बिगाड़ते हैं, बल्कि देश की संवैधानिक भावना के भी खिलाफ हैं।
कई संगठनों ने यह भी कहा कि किसी महिला के पहनावे पर टिप्पणी करना या उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित करना स्वीकार्य नहीं है, खासकर तब जब वह सरकारी सेवा में नियुक्त हो रही हो।
कानूनी और संवैधानिक पहलू
कानून विशेषज्ञों का कहना है कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अभिव्यक्ति का अधिकार देता है। जब तक कोई पहनावा कानून या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा नहीं बनता, तब तक उस पर रोक लगाना संवैधानिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में बयानबाजी से ज्यादा संवेदनशीलता और संतुलन की जरूरत थी।
सियासी असर
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह मुद्दा आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति में और तूल पकड़ सकता है। विपक्ष इसे महिला सम्मान और अल्पसंख्यक अधिकारों से जोड़कर उठाएगा, जबकि बीजेपी और उसके समर्थक इसे अनुशासन और सार्वजनिक आचरण से जोड़ने की कोशिश करेंगे।
कुल मिलाकर, पटना का यह घटनाक्रम अब सिर्फ एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह धार्मिक स्वतंत्रता, महिला अधिकार और राजनीति के बड़े टकराव का प्रतीक बन चुका है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर बयानबाजी और तेज होने की पूरी संभावना है।
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