पर्यावरण को राहत, अरावली पर सुप्रीम कोर्ट का ब्रेक!

जयराम रमेश ने कहा कि यह किसी राजनीतिक पार्टी या किसी व्यक्ति की जीत नहीं है, यह भारत के पर्यावरण को बचाने और सांस लेने में आसानी के लिए एक जीत है.

कांग्रेस सांसद और वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ी और अहम राहत बताया है। उन्होंने कहा कि यह फैसला किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति की जीत नहीं है, बल्कि यह देश के पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधनों और करोड़ों लोगों को स्वच्छ हवा देने की लड़ाई में एक महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है और अरावली को पूरी तरह सुरक्षित करने के लिए आगे भी सतर्कता और प्रयास जरूरी हैं।

पर्यावरण को राहत, अरावली पर सुप्रीम कोर्ट का ब्रेक!
पर्यावरण को राहत, अरावली पर सुप्रीम कोर्ट का ब्रेक!

जयराम रमेश ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि अरावली पर्वतमाला देश की सबसे प्राचीन और संवेदनशील पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। यह न केवल उत्तर भारत के पर्यावरण संतुलन के लिए बेहद जरूरी है, बल्कि दिल्ली-एनसीआर समेत आसपास के क्षेत्रों को प्रदूषण से बचाने में भी इसकी बड़ी भूमिका है। उन्होंने कहा कि अरावली के जंगल और पहाड़ियां प्राकृतिक ढाल का काम करती हैं, जो मरुस्थलीकरण को रोकने और भूजल स्तर को बनाए रखने में सहायक हैं।

कांग्रेस सांसद ने बताया कि अरावली की नई परिभाषा को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था। इस नई परिभाषा के जरिए पर्वतमाला के बड़े हिस्से को वन क्षेत्र की श्रेणी से बाहर करने का रास्ता खुल सकता था। इससे खनन, निर्माण और औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की आशंका थी, जो पर्यावरण के लिए बेहद नुकसानदायक साबित हो सकती थीं। जयराम रमेश ने कहा कि इस नई परिभाषा का विरोध केवल राजनीतिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि विशेषज्ञ संस्थाओं द्वारा भी किया गया था।

उन्होंने यह भी कहा कि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) और सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी पहले से ही अरावली की नई परिभाषा पर गंभीर आपत्तियां जता चुकी थीं। इन संस्थाओं का मानना था कि नई परिभाषा से अरावली के पारिस्थितिकी तंत्र को भारी नुकसान पहुंच सकता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस फैसले पर रोक लगाना एक सकारात्मक और जरूरी कदम है।

जयराम रमेश ने इसे पर्यावरण के लिए एक “अंतरिम जीत” करार देते हुए कहा कि इससे यह साफ संदेश गया है कि देश की सर्वोच्च अदालत पर्यावरण संरक्षण को लेकर गंभीर है। उन्होंने कहा कि यह फैसला यह भी दर्शाता है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना कितना जरूरी है। केवल तात्कालिक आर्थिक लाभ के लिए प्राकृतिक विरासत को दांव पर नहीं लगाया जा सकता।

हालांकि, कांग्रेस नेता ने यह भी चेतावनी दी कि यह लड़ाई अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि अरावली को लेकर भविष्य में भी ऐसे प्रयास हो सकते हैं, जो पर्यावरण के लिए खतरा बनें। इसलिए जरूरी है कि सरकार, न्यायपालिका, पर्यावरण विशेषज्ञ और आम जनता सभी मिलकर इस मुद्दे पर सतर्क रहें। उन्होंने कहा कि अरावली का संरक्षण केवल कानूनों से नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और जनजागरूकता से भी संभव है।

जयराम रमेश ने यह भी कहा कि अरावली की रक्षा का सीधा संबंध आम लोगों के जीवन से है। दिल्ली-एनसीआर और आसपास के इलाकों में बढ़ते प्रदूषण, गिरते भूजल स्तर और बदलते मौसम के पीछे अरावली का कमजोर होना भी एक बड़ा कारण है। यदि इस पर्वतमाला को नुकसान पहुंचाया गया, तो इसके दुष्परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भुगतने पड़ेंगे।

अपने बयान में उन्होंने यह संकेत भी दिया कि इस पूरे मामले में जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। हालांकि उन्होंने किसी का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया, लेकिन यह स्पष्ट किया कि जिन नीतियों या फैसलों से पर्यावरण को नुकसान पहुंचने का खतरा हो, उन पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली की नई परिभाषा पर लगाई गई रोक को पर्यावरण संरक्षण के लिए एक अहम कदम माना जा रहा है। जयराम रमेश के अनुसार, यह फैसला एक चेतावनी भी है कि प्रकृति के साथ समझौता करने की कोई भी कोशिश अंततः न्यायिक और सामाजिक जांच के दायरे में आएगी। अब सभी की नजरें इस बात पर हैं कि आगे इस मामले में क्या फैसला होता है और क्या अरावली को स्थायी संरक्षण मिल पाता है या नहीं।

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