यूपी की राजनीति में 2027 से पहले भोज और ब्राह्मणों की बैठक ने पार्टियों के बीच हलचल मचा दी है. बीजेपी के ब्राह्मणों की बैठक के बाद अब SP ने अपना दांव चलकर माहौल और गरमा दिया है.
नए साल की शुरुआत के साथ ही उत्तर प्रदेश की सियासत ने भी रफ्तार पकड़ ली है। भले ही विधानसभा चुनाव 2027 में होने हैं, लेकिन राजनीतिक दलों ने अभी से अपनी-अपनी रणनीतियों पर काम शुरू कर दिया है। मोर्चेबंदी, सामाजिक समीकरण और प्रतीकात्मक राजनीति के जरिए मतदाताओं को साधने की कवायद तेज हो गई है। हाल के दिनों में बीजेपी द्वारा ब्राह्मण समाज को लेकर की गई बैठक ने प्रदेश की राजनीति में हलचल मचा दी थी। हालांकि बीजेपी ने इस बैठक को सामान्य सहभोज बताया, लेकिन विपक्ष इसे जातीय संतुलन साधने की कोशिश के तौर पर देख रहा है। इसी मुद्दे की गूंज अभी थमी भी नहीं थी कि समाजवादी पार्टी ने एक नया सियासी दांव चलकर माहौल और गरमा दिया है।

दरअसल, समाजवादी पार्टी ने साल के पहले ही दिन एक ऐसे आयोजन के जरिए सियासी संदेश देने की कोशिश की, जिसकी चर्चा दूर तक हो रही है। 1 जनवरी को लखनऊ स्थित समाजवादी पार्टी के प्रदेश कार्यालय में बाटी-चोखा का आयोजन किया गया। गुनगुनी धूप में हुए इस आयोजन में हर वर्ग के लोगों को आमंत्रित किया गया। आम नागरिकों के साथ-साथ पार्टी कार्यकर्ता, पदाधिकारी और वरिष्ठ नेता भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए और एक साथ बैठकर पारंपरिक व्यंजन बाटी-चोखा का स्वाद लिया।
इस आयोजन को केवल एक भोज के रूप में नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टी की नई राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि यह कार्यक्रम सामाजिक समरसता और जमीनी राजनीति का प्रतीकात्मक संदेश देने के लिए आयोजित किया गया। बाटी-चोखा उत्तर प्रदेश के ग्रामीण और पिछड़े इलाकों से जुड़ा एक लोकप्रिय व्यंजन है, जिसे आम तौर पर साधारण और श्रमिक वर्ग से जोड़ा जाता है। ऐसे में सपा का यह कदम सीधे तौर पर अपने पारंपरिक वोट बैंक के साथ-साथ अन्य वर्गों को भी जोड़ने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

कार्यक्रम के दौरान समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव भी मौजूद रहे। उन्होंने कार्यकर्ताओं और आम लोगों से मुलाकात की, उनसे बातचीत की और नए साल की शुभकामनाएं दीं। अखिलेश यादव का आम लोगों के साथ घुलना-मिलना और एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करना पार्टी की ‘जनता के बीच रहने’ वाली राजनीति को रेखांकित करता है। सपा नेताओं का कहना है कि पार्टी हमेशा से जमीन से जुड़ी राजनीति करती रही है और यह आयोजन उसी सोच का विस्तार है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी की ब्राह्मण बैठक के बाद समाजवादी पार्टी ने यह कदम उठाकर एक तरह से जवाबी सियासत की है। विपक्ष लगातार बीजेपी पर जातीय आधार पर राजनीति करने का आरोप लगाता रहा है। ऐसे में सपा का यह आयोजन खुद को सामाजिक सौहार्द और समावेशी राजनीति की पार्टी के रूप में पेश करने की कोशिश माना जा रहा है। विपक्षी दलों की बैठकों की याद दिलाते हुए सपा समर्थक अब ‘चोखा-बाटी’ के बहाने तंज भी कस रहे हैं।
हालांकि बीजेपी ने अपने स्तर पर इस आयोजन को लेकर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे 2027 के चुनाव की तैयारी के शुरुआती संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि आने वाले समय में सभी दल अपने-अपने सामाजिक और राजनीतिक प्रयोगों को और तेज करेंगे।
कुल मिलाकर, समाजवादी पार्टी का यह बाटी-चोखा आयोजन यूपी की सियासत में नए साल की पहली बड़ी राजनीतिक हलचल के रूप में सामने आया है। यह साफ संकेत देता है कि 2027 का चुनाव भले ही दूर हो, लेकिन उसकी बिसात अभी से बिछने लगी है। आने वाले महीनों में ऐसे और भी सियासी प्रयोग देखने को मिल सकते हैं, जो प्रदेश की राजनीति को लगातार गर्माते रहेंगे।