प्रत्युष राज जैन: दिव्यांगता नहीं, जज़्बे की जीत की कहानी

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Of Course, I Can: प्रत्युष राज जैन की हौसलों भरी कहानी,जहाँ सीमाएँ टूटीं और सपने जीते

खेल के मैदान में जीत-हार को सेकंड, मीटर और अंकों में मापा जाता है। लेकिन कुछ मैदान ऐसे भी होते हैं, जहाँ प्रदर्शन का मूल्य पदकों से कहीं आगे जाकर आत्मविश्वास, आत्मसम्मान और समाज की सोच बदलने में दिखाई देता है। 15 वर्षीय प्रत्युष राज जैन की कहानी ऐसी ही एक मिसाल है—जहाँ प्रतिबद्धता है, परफॉर्मेंस है, पदक हैं और सबसे बढ़कर उस जिजीविषा के प्रति गहरा प्रेम है, जो दिव्यांगता को कमजोरी नहीं, बल्कि विशेष क्षमता के रूप में परिभाषित करती है।

प्रत्युष राज जैन: दिव्यांगता नहीं, जज़्बे की जीत की कहानी
प्रत्युष राज जैन: दिव्यांगता नहीं, जज़्बे की जीत की कहानी

बौद्धिक दिव्यांगता के साथ जीवन जी रहे प्रत्युष के लिए 2025–26 का खेल सत्र आत्मविश्वास और उपलब्धियों का स्वर्णिम अध्याय बनकर सामने आया है। तैराकी और एथलेटिक्स—दोनों खेलों में राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर शानदार प्रदर्शन करते हुए उन्होंने न केवल पदक अपने नाम किए, बल्कि समाज में मौजूद उन धारणाओं को भी चुनौती दी, जो दिव्यांगता को सीमाओं से जोड़कर देखती हैं।

जब प्रत्युष स्विमिंग पूल के किनारे खड़ा होता है और पानी में उतरता है, तो वह केवल एक तैराक नहीं रह जाता। वह संघर्ष, साधना और सफलता की जीवंत कहानी बन जाता है। उसकी आँखों में गहरी एकाग्रता और चेहरे पर आत्मविश्वास साफ झलकता है। पानी की हर लहर के साथ वह अपने डर, असमंजस और सीमाओं को पीछे छोड़ता चला जाता है। तैराकी उसके लिए सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि खुद से जीतने का माध्यम बन चुकी है।

हालांकि यह सफर आसान नहीं रहा। रोज़ाना का कठोर अभ्यास, अनुशासन और निरंतर धैर्य—इन तीनों ने प्रत्युष को एक मजबूत खिलाड़ी के रूप में गढ़ा। शुरुआती दिनों में चुनौतियाँ थीं, थकान थी और कई बार निराशा भी, लेकिन उसने हार मानने के बजाय खुद को और बेहतर बनाने का रास्ता चुना। दिल्ली राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं में तीन स्वर्ण और एक रजत पदक जीतकर उसने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।

इसके बाद स्पेशल ओलंपिक्स राज्य चैंपियनशिप में 25 और 50 मीटर फ्रीस्टाइल स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक हासिल कर प्रत्युष ने अपनी निरंतरता साबित की। वहीं तीसरी दिल्ली राज्य पैरा तैराकी चैंपियनशिप में 200 मीटर फ्रीस्टाइल में स्वर्ण और 100 मीटर में रजत पदक जीतकर उसने राज्य स्तर पर अपनी मजबूत पकड़ दर्ज कराई।

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यहीं से प्रत्युष ने राष्ट्रीय मंच की ओर कदम बढ़ाया। हैदराबाद में आयोजित 35वीं राष्ट्रीय पैरा तैराकी चैंपियनशिप में 200 मीटर फ्रीस्टाइल में 9वां और 100 मीटर में 11वां स्थान हासिल कर उन्होंने यह साबित कर दिया कि जज़्बा और मेहनत किसी भी शारीरिक या बौद्धिक चुनौती से कहीं बड़े होते हैं। यह उपलब्धि भले पदक में न बदली हो, लेकिन अनुभव और आत्मविश्वास के लिहाज़ से यह उनके करियर का अहम पड़ाव रही।

इस सफलता के पीछे एस.पी. मुखर्जी स्विमिंग पूल कॉम्प्लेक्स और कोच रणबीर शर्मा का अहम योगदान रहा। कोच रणबीर शर्मा ने प्रत्युष को सिर्फ तकनीक नहीं सिखाई, बल्कि अनुशासन, आत्मनियंत्रण और मानसिक मजबूती भी दी। उन्होंने प्रत्युष को एक जिम्मेदार और आत्मविश्वासी खिलाड़ी के रूप में तैयार किया।

तैराकी के साथ-साथ प्रत्युष ने एथलेटिक्स में भी अपनी पहचान बनाई। फरवरी 2026 में आयोजित दिल्ली राज्य पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उन्होंने गोला फेंक में रजत पदक, जबकि लंबी कूद और 400 मीटर दौड़ में कांस्य पदक जीतकर अपनी बहुआयामी प्रतिभा का परिचय दिया। स्पोर्टेबिलिटी खेल अकादमी में मिला प्रशिक्षण, नरेश सचदेवा के नेतृत्व और कोच संजय के मार्गदर्शन ने उनके भीतर छिपी क्षमता को नई दिशा दी।

प्रत्युष की कहानी यह बताती है कि मंच भले बदल जाए, लेकिन मेहनत और समर्पण से मंज़िल जरूर मिलती है। बौद्धिक दिव्यांग बच्चों के लिए खेल केवल पसीना बहाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवन को समझने और संवारने की पाठशाला है। खेल के मैदान ने प्रत्युष को सिखाया कि ध्यान कैसे केंद्रित किया जाता है, शरीर और मन के बीच संतुलन कैसे बनाया जाता है। हार ने उसे टूटना नहीं, बल्कि संभलना सिखाया और जीत ने विनम्रता का पाठ पढ़ाया।

टीम के साथ खेलते हुए उसने ‘मैं’ से ‘हम’ तक का सफर तय किया। खेल ने उसके भीतर आत्मविश्वास की ऐसी लौ जलाई, जिसने उसे जीवन के हर अंधेरे से भिड़ने का साहस दिया।

प्रत्युष राज जैन की कहानी उन हजारों परिवारों के लिए आशा की किरण है, जो अपने दिव्यांग बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं। सच यही है कि यदि उन्हें सही मंच, मार्गदर्शन और अवसर मिलें, तो हर दिव्यांग बच्चा पूरे विश्वास के साथ कह सकता है—
“Of course, I can.”

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