“विपक्षी गठबंधन में दरार! सीट बंटवारे से पहले ही CPI(ML) ने उतारा अपना उम्मीदवार”

बिहार में सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों गठबंधन में अनबन चल रही है। इंडिया गठबंधन में सीट बंटवारे का ऐलान होने से पहले उम्मीदवार का ऐलान हो चुका है। वहीं, एनडीए गठबंधन में ओपी राजभर सीटों की मांग को लेकर नाखुश हैं।

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का माहौल धीरे-धीरे गरमाता जा रहा है। चुनाव आयोग द्वारा तारीखों की घोषणा के बाद सभी राजनीतिक दल उम्मीदवारों की सूची तैयार करने में जुटे हैं। इसी बीच विपक्षी गठबंधन में दरार के संकेत मिलने लगे हैं। महागठबंधन के अहम घटक दल CPI(ML) (भाकपा-माले) ने सीट बंटवारे की आधिकारिक घोषणा से पहले ही अपने उम्मीदवार का ऐलान कर दिया है, जिससे गठबंधन के भीतर असंतोष और अविश्वास का माहौल बन गया है।

"विपक्षी गठबंधन में दरार! सीट बंटवारे से पहले ही CPI(ML) ने उतारा अपना उम्मीदवार"
“विपक्षी गठबंधन में दरार! सीट बंटवारे से पहले ही CPI(ML) ने उतारा अपना उम्मीदवार”

घोसी सीट से रामबली सिंह मैदान में

CPI(ML) ने घोषणा की है कि वह घोसी विधानसभा सीट से अपने वर्तमान विधायक रामबली सिंह यादव को उम्मीदवार बनाएगी। इस ऐलान के साथ ही माले ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि वह इस सीट को किसी अन्य दल के लिए छोड़ने को तैयार नहीं है।
पार्टी की राज्य इकाई ने अपने बयान में कहा कि रामबली सिंह यादव ने क्षेत्र में लगातार संघर्ष किया है और जनता से गहरा जुड़ाव रखते हैं, इसलिए संगठन ने उन्हें दोबारा प्रत्याशी बनाने का निर्णय लिया है।

तेजस्वी यादव के कदम से माले नाराज़?

तेजस्वी यादव के कदम से माले नाराज़?
तेजस्वी यादव के कदम से माले नाराज़?

दरअसल, दो दिन पहले ही राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी यादव ने जदयू के पूर्व विधायक राहुल शर्मा को पार्टी की सदस्यता दिलाई थी। राहुल शर्मा भूमिहार जाति से आते हैं और उनका प्रभाव घोसी इलाके में माना जाता है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, तेजस्वी यादव का यह कदम घोसी सीट पर राजद की दावेदारी को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा था। माना जा रहा है कि राजद, राहुल शर्मा को इसी सीट से उम्मीदवार बना सकती है।
यही कारण है कि माले ने पूर्व-आशंका के तहत सीट बंटवारे से पहले ही अपने उम्मीदवार की घोषणा कर दी, ताकि यह संदेश जाए कि यह सीट पहले से उनकी है और यहां से कोई दूसरा उम्मीदवार नहीं उतारा जा सकता।

विपक्षी गठबंधन में बढ़ती खींचतान

महागठबंधन में पहले से ही सीट बंटवारे को लेकर खींचतान की खबरें आ रही थीं। राजद, कांग्रेस, और माले के बीच कई सीटों पर मतभेद बने हुए हैं। माले का दावा है कि 2020 के चुनाव में उसके प्रदर्शन को देखते हुए उसे इस बार ज्यादा सीटें मिलनी चाहिए।
2020 के विधानसभा चुनाव में माले ने 19 सीटों पर जीत दर्ज की थी और विपक्षी गठबंधन की सफलता में अहम भूमिका निभाई थी। अब पार्टी चाहती है कि उसके प्रभाव वाले इलाकों — खासकर भोजपुर, आरा, सासाराम और औरंगाबाद — में उसे अधिक टिकट दिए जाएं।
राजद की ओर से हालांकि अभी तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है, लेकिन अंदरखाने चर्चा है कि यह कदम गठबंधन की एकता के लिए “चेतावनी” जैसा है।

गठबंधन की रणनीति पर सवाल

राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि माले का यह कदम विपक्षी गठबंधन की एकता पर सवाल खड़े करता है। यदि हर दल अपनी-अपनी सीटें पहले घोषित करने लगे, तो “सीट शेयरिंग” का पूरा अर्थ ही खत्म हो जाएगा।
महागठबंधन की रणनीति यह थी कि सभी दल मिलकर एक साझा सूची जारी करेंगे, ताकि बीजेपी के खिलाफ एकजुट मोर्चा पेश किया जा सके। लेकिन माले की इस घोषणा से गठबंधन की बातचीत को झटका लगा है।

बीजेपी और एनडीए को मिल सकता है फायदा

विपक्षी दलों के बीच इस असहमति से सत्तारूढ़ एनडीए को निश्चित तौर पर फायदा मिल सकता है। बीजेपी और जदयू पहले ही संयुक्त रणनीति पर काम कर रहे हैं और उन्होंने कई सीटों पर प्रत्याशियों के नाम लगभग तय कर लिए हैं।
अगर महागठबंधन में सीट बंटवारे पर विवाद लंबा चला, तो विपक्षी मतों के बंटने का खतरा बढ़ जाएगा। इससे भाजपा गठबंधन को कई सीटों पर सीधा फायदा हो सकता है।

माले का रुख सख्त

CPI(ML) ने साफ कहा है कि वह अपने मजबूत जनाधार वाली सीटों पर समझौता नहीं करेगी। पार्टी के राज्य सचिव ने बयान जारी करते हुए कहा कि “हमारी लड़ाई सिद्धांतों की है, न कि कुर्सी की। घोसी में हमारे कार्यकर्ता सालों से संघर्ष कर रहे हैं, इसलिए यह सीट हमारा अधिकार है।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि गठबंधन में सम्मानजनक साझेदारी नहीं मिलती, तो पार्टी अपने दम पर चुनाव लड़ने का विकल्प भी खुला रखेगी।

निष्कर्ष

सीपीआई (माले) द्वारा घोसी से उम्मीदवार घोषित करने के बाद बिहार में विपक्षी गठबंधन के भीतर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। तेजस्वी यादव द्वारा राहुल शर्मा को राजद में शामिल करने और माले के प्रत्याशी ऐलान को लेकर दोनों दलों के बीच खींचतान तेज हो गई है।
अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सीट बंटवारे की आधिकारिक घोषणा के दौरान महागठबंधन इन मतभेदों को कैसे सुलझाता है।
यदि यह टकराव नहीं थमा, तो बिहार चुनाव में विपक्ष की “एकजुटता की तस्वीर” कमजोर पड़ सकती है — जिसका सीधा फायदा एनडीए को मिल सकता है।

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