बेतिया सीट पर सियासी संग्राम: रेणु देवी और वसी अहमद आमने-सामने !

बेतिया विधानसभा सीट पर इस बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच कड़ी टक्कर है। तीसरे उम्मीदवार जनसुराज के अनिल कुमार सिंह भी चुनाव मैदान में हैं। जानें क्या कहते हैं समीकरण, किसे मिल सकती है जीत?

बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में 11 नवंबर को वोटिंग होनी है, जबकि मतगणना 14 नवंबर को होगी। पश्चिम चंपारण की बेतिया विधानसभा सीट इस बार राज्य के सबसे चर्चित निर्वाचन क्षेत्रों में से एक बन गई है। यहां मुकाबला त्रिकोणीय लेकिन मुख्य टक्कर भाजपा की रेणु देवी और कांग्रेस के वसी अहमद के बीच मानी जा रही है। वहीं, तीसरे मोर्चे पर जनसुराज पार्टी के अनिल कुमार सिंह ने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है।

बेतिया सीट पर सियासी संग्राम: रेणु देवी और वसी अहमद आमने-सामने !
बेतिया सीट पर सियासी संग्राम: रेणु देवी और वसी अहमद आमने-सामने !

ऐतिहासिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि

बेतिया सीट का राजनीतिक इतिहास हमेशा से ही उतार-चढ़ाव भरा रहा है। यह सीट पश्चिम चंपारण की सबसे महत्वपूर्ण सीटों में गिनी जाती है। साल 2015 के चुनाव में कांग्रेस ने इस सीट पर जीत दर्ज की थी, लेकिन 2020 में भाजपा की रेणु देवी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए यह सीट अपने नाम की और बाद में बिहार की उपमुख्यमंत्री बनीं। अब 2025 का चुनाव उनके लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुका है।

रेणु देवी भाजपा की एक वरिष्ठ और लोकप्रिय महिला नेता हैं, जिनकी पकड़ न सिर्फ बेतिया बल्कि पूरे चंपारण क्षेत्र में मजबूत मानी जाती है। वे लगातार महिलाओं के सशक्तिकरण, विकास योजनाओं और स्थानीय मुद्दों पर काम करने का दावा करती रही हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस ने इस बार अपने पुराने किले को फिर से हासिल करने के लिए वसी अहमद पर भरोसा जताया है — जो शिक्षित, शांत स्वभाव और सामाजिक जुड़ाव के लिए जाने जाते हैं।

त्रिकोणीय मुकाबला बना दिलचस्प

जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की पार्टी ने इस बार बिहार के कई इलाकों में मजबूत एंट्री की है, और अनिल कुमार सिंह को बेतिया से टिकट देकर यहां मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। अनिल कुमार सिंह स्थानीय स्तर पर एक नया लेकिन तेज़ी से उभरता चेहरा हैं, जो “नई राजनीति” और “विकास की नई दिशा” का नारा देकर युवाओं को आकर्षित करने की कोशिश में हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, जनसुराज का वोट शेयर भले सीमित हो, लेकिन वह भाजपा और कांग्रेस दोनों के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगा सकता है। अगर जनसुराज को 8–10% वोट भी मिलते हैं, तो यह मुकाबले का परिणाम अप्रत्याशित बना सकता है।

स्थानीय मुद्दे और जनता की नब्ज

बेतिया के मतदाता इस बार रोजगार, बाढ़ प्रबंधन, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, और सड़क विकास जैसे मुद्दों को लेकर मुखर हैं। भाजपा इन चुनावों में केंद्र और राज्य की विकास योजनाओं — जैसे प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, और महिला सुरक्षा अभियानों — को अपनी उपलब्धियों के तौर पर जनता के सामने रख रही है।

रेणु देवी जनता से यह कह रही हैं कि “बेतिया ने जितना विकास पिछले पांच सालों में देखा है, उतना कभी नहीं हुआ।” वहीं, कांग्रेस के वसी अहमद का कहना है कि “सरकार ने वादे तो बहुत किए, लेकिन बेरोजगारी और महंगाई से जनता बेहाल है।”

जनसुराज के अनिल कुमार सिंह मुद्दों की राजनीति कर रहे हैं। वे लगातार यह कह रहे हैं कि “अब जनता को वादे नहीं, परिणाम चाहिए। नई सोच और पारदर्शी राजनीति से ही बिहार बदलेगा।”

जातीय और सामाजिक समीकरण

बेतिया में यादव, कुशवाहा, ब्राह्मण, मुस्लिम और दलित मतदाताओं की संख्या संतुलित है। भाजपा को परंपरागत रूप से उच्च जाति और व्यवसायिक वर्ग का समर्थन मिलता है, जबकि कांग्रेस अल्पसंख्यक और पिछड़ा वर्ग के वोटों पर भरोसा कर रही है। जनसुराज की कोशिश है कि वह जातिगत रेखाओं से ऊपर उठकर युवा और नए मतदाताओं को अपने पक्ष में करे।

माहौल गर्म, नतीजे पर सभी की नज़र

जैसे-जैसे चुनाव की तारीख नज़दीक आ रही है, बेतिया का माहौल बेहद गर्म होता जा रहा है। गांवों में नुक्कड़ सभाएँ, रोड शो और घर-घर प्रचार अभियान तेज़ हो गए हैं। भाजपा पूरी ताकत से रेणु देवी के पक्ष में मैदान में है, जबकि कांग्रेस भी इस बार संगठन के स्तर पर सक्रिय दिख रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रेणु देवी को हल्की बढ़त जरूर है, लेकिन कांग्रेस के वसी अहमद ने भी मजबूत पकड़ बनाई है। जनसुराज की मौजूदगी मुकाबले को और पेचीदा बना रही है।

नतीजा चाहे जो भी हो, लेकिन यह तय है कि बेतिया सीट का परिणाम बिहार की सियासत की दिशा तय करेगा — क्या भाजपा अपना गढ़ बचा पाएगी या कांग्रेस दोबारा वापसी करेगी? यह फैसला 14 नवंबर को मतगणना के बाद साफ होगा।

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