सपा नेता मनीष जगन अग्रवाल ने कहा कि गोमती नदी सफाई और रिवर फ्रंट एक मॉडल है जिससे देश की कोई भी नदी साफ होगी और सुंदरता बढ़ेगी. दीपक सिंघल के लिए कांग्रेस कोई और मसाला ढूंढें.
कांग्रेस द्वारा हाल ही में शुरू की गई भ्रष्टाचार-रोधी मुहिम अब INDIA गठबंधन के भीतर मतभेदों को उजागर करती दिख रही है। राहुल गांधी के खिलाफ पत्र लिखने वाले 272 पूर्व अधिकारियों को घेरने के लिए कांग्रेस ने जो अभियान लॉन्च किया था, वह अब राजनीतिक विवाद का रूप ले चुका है। इस मुहिम के तहत कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर कई पोस्टर जारी किए, जिनमें संबंधित अधिकारियों पर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए। लेकिन इन्हीं पोस्टरों में शामिल एक नाम को लेकर सपा खेमे ने कांग्रेस की तथ्यहीनता पर सवाल उठा दिए हैं।

कांग्रेस के सोशल मीडिया हैंडल पर जारी एक पोस्टर में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव दीपक सिंघल पर गोमती रिवरफ्रंट प्रोजेक्ट में 1500 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप लगाया गया था। कांग्रेस ने इस प्रोजेक्ट को भ्रष्टाचार का क्लासिक उदाहरण बताते हुए सिंघल को कटघरे में खड़ा किया था। लेकिन इसी दावे पर सपा नेताओं ने आपत्ति जताई है, जिसके बाद गठबंधन की आंतरिक राजनीति एक बार फिर सतह पर आ गई है।
समाजवादी पार्टी व्यापार सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनीष जगन अग्रवाल ने कांग्रेस के पोस्टर पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पार्टी को किसी भी व्यक्ति पर आरोप लगाने से पहले तथ्यों की पूरी जांच करनी चाहिए। उन्होंने कांग्रेस पर “गलत जानकारी फैलाने” का आरोप लगाया। जगन ने कहा कि गोमती रिवरफ्रंट प्रोजेक्ट कोई घोटाला नहीं था, बल्कि एक शहरी विकास का सफल मॉडल था जिसे राजनीति से प्रेरित होकर बदनाम किया गया।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस को दीपक सिंघल के खिलाफ “कोई और मसाला” खोजना चाहिए, क्योंकि रिवरफ्रंट का मुद्दा तथ्यात्मक रूप से गलत है। उनके मुताबिक, कांग्रेस जो पोस्टर और आरोप पेश कर रही है, वह गठबंधन की एकता को कमजोर करता है और यह संदेश देता है कि विपक्ष के भीतर समन्वय की कमी है। उनके बयान से साफ है कि सपा इस अभियान से आहत है और इसे गठबंधन की राजनीति के लिए नुकसानदेह मान रही है।
कांग्रेस की भ्रष्टाचार मुहिम का उद्देश्य था—राहुल गांधी के खिलाफ पत्र लिखने वाले पूर्व अधिकारियों की पृष्ठभूमि उजागर करना और जनता के सामने यह दिखाना कि कथित ‘ईमानदारी का चेहरा’ पेश करने वाले लोग खुद गंभीर भ्रष्टाचार मामलों में संलिप्त रहे हैं। लेकिन इस पहल ने अनजाने में सपा जैसे सहयोगी दलों को भी असहज स्थिति में ला खड़ा किया है।
विशेष रूप से उत्तर प्रदेश की राजनीति में गोमती रिवरफ्रंट प्रोजेक्ट संवेदनशील मुद्दा रहा है। यह परियोजना अखिलेश यादव सरकार की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिनी जाती रही है। ऐसे में इस प्रोजेक्ट को घोटाला बताना सपा समर्थकों और नेताओं को स्वाभाविक रूप से खटका।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद गठबंधन के भीतर की कमजोरियों को उजागर करता है। कांग्रेस की इस मुहिम में शामिल की गई कुछ सामग्रियां बिना समन्वय के तैयार की गई लगती हैं। इससे संदेश जाता है कि गठबंधन में साझा रणनीति और संवाद की कमी है। यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस और सपा के बीच किसी मुद्दे पर मतभेद सामने आए हों—इससे पहले सीट बंटवारे, अभियान की रणनीति और नेतृत्व को लेकर भी दोनों दलों के बीच तनाव देखा जा चुका है।
वहीं, कांग्रेस की ओर से अभी तक इस विवाद पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। लेकिन अंदरखाने यह चर्चा है कि पार्टी अपनी मुहिम को जारी रखेगी और जो अधिकारी सरकार विरोधी पत्र अभियान का हिस्सा बने हैं, उन्हें जवाबदेही के कठघरे में खड़ा करती रहेगी।
हालांकि, सपा की इस प्रतिक्रिया ने कांग्रेस की रणनीति पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। एक ओर विपक्ष सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश में जुटा है, वहीं दूसरी ओर परस्पर अविश्वास और असहमति उसके लिए मुश्किलें पैदा कर रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम का असर आने वाले महीनों में गठबंधन की कार्यशैली पर भी दिख सकता है। अगर ऐसे विवाद बढ़ते हैं, तो विपक्ष के लिए संयुक्त मोर्चा बनाना चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि कांग्रेस के ‘करप्शन पोस्टर अभियान’ ने न सिर्फ सरकार विरोधी माहौल बनाने का प्रयास किया, बल्कि अनजाने में INDIA गठबंधन की एकजुटता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।