RBI के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने ट्रंप के भारत पर 50% टैरिफ को लेकर बड़ा दावा किया. उन्होंने कहा कि ट्रंप ने रूस की वजह से नहीं बल्कि भारत-पाकिस्तान सीजफायर की वजह से लगाया था.
भारत के प्रमुख अर्थशास्त्री और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भारत–पाकिस्तान के बीच हालिया तनाव में आई नरमी और संघर्ष विराम पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। यूबीएस सेंटर फोरम फॉर इकोनॉमिक डायलॉग में बोलते हुए उन्होंने कहा कि सीज़फायर की असली वजह “सीज़फायर क्रेडिट” है, जिसका रूस से तेल खरीदने जैसी आर्थिक रणनीतियों से कोई संबंध नहीं है। उनका यह बयान तब आया है जब इस मुद्दे को लेकर अंतरराष्ट्रीय और घरेलू स्तर पर कई प्रकार की व्याख्याएँ सामने आ रही थीं।

रघुराम राजन ने साफ कहा कि इस पूरे विवाद का मूल कारण आर्थिक नहीं बल्कि कूटनीतिक है। उनके अनुसार, भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कम होने का श्रेय किसे जाए, इसी सवाल ने दोनों देशों के बीच भ्रम और बयानबाज़ी को जन्म दिया है। उन्होंने कहा, “यह विवाद व्यक्तियों और भारत–पाकिस्तान तनाव कम करने के श्रेय को लेकर कूटनीतिक असहमति से उपजा है। इसे किसी भी तरह से रूस से तेल खरीद या ऊर्जा नीति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।”
राजन के बयान को विशेषज्ञ व्यापक क्षेत्रीय कूटनीति से जोड़कर देख रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में भारत और पाकिस्तान के बीच कई स्तरों पर बैक-चैनल वार्ताएँ और सुरक्षा वार्ताएँ चली हैं, जिसके बाद सीमाओं पर स्थिति पहले की अपेक्षा अधिक शांत हुई है। लेकिन इस शांति का कारण क्या है, इस पर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं—कहीं रूस से तेल खरीदने को लेकर अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप का जिक्र हुआ, कहीं चीन की भूमिका की बात कही गई, तो कहीं इस पूरी प्रक्रिया को अमेरिका की मध्यस्थता का परिणाम बताया गया। रघुराम राजन ने अपने बयान में इन सभी अटकलों को खारिज किया।
यूबीएस फोरम में राजन ने यह भी कहा कि “सीज़फायर क्रेडिट” एक ऐसा शब्द है जिसका उपयोग कूटनीति में उस परिस्थिति के लिए किया जाता है जब दो देश किसी संघर्ष को रोकने या कम करने का श्रेय लेने की कोशिश में एक-दूसरे से राजनीतिक टकराव में फँस जाते हैं। उन्होंने कहा कि दक्षिण एशिया जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यह स्थिति सामान्य है, क्योंकि दोनों देशों की राजनीतिक प्रतिष्ठा और आंतरिक राजनीति बहुत हद तक इस पर निर्भर रहती है कि जनता और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को कौन कितना प्रभावी दिखता है।

राजन ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत का ऊर्जा सुरक्षा मॉडल और रूस से तेल खरीदने क्या फैसले पूरी तरह आर्थिक और रणनीतिक आधार पर लिए जाते हैं, न कि क्षेत्रीय द्विपक्षीय तनावों को कम करने के लिए। उन्होंने कहा, “भारत की ऊर्जा नीति को भू-राजनीतिक स्थिरता के चश्मे से देखना पूरी तरह सटीक नहीं है। भारत जो तेल खरीदता है, वह अपनी जरूरत और वैश्विक बाजार के हिसाब से करता है। इसका पड़ोसी देशों की नीति या संघर्ष विराम से कोई संबंध नहीं।”
उन्होंने आगे यह भी कहा कि किसी भी देश के लिए अपनी आर्थिक नीति को विदेशी संबंधों के साथ जोड़ना एक हद तक संभव तो है, लेकिन उसे मुख्य कारक बताना गलत होगा। राजन ने कहा कि दक्षिण एशिया में स्थिरता का अधिकतर श्रेय रक्षा, सुरक्षा और कूटनीतिक प्रयासों को जाता है, जिसे अक्सर सार्वजनिक रूप से उजागर नहीं किया जाता।
विश्लेषकों का मानना है कि राजन का यह बयान वर्तमान समय में काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि हाल के महीनों में अंतरराष्ट्रीय मीडिया में यह धारणा बनाई जा रही थी कि भारत–पाकिस्तान के बीच तनाव में कमी बाहरी ऊर्जा सौदों के कारण है। राजन ने एक तरह से यह स्पष्ट कर दिया कि कूटनीति और राजनीतिक संवाद ही इस स्थिति के वास्तविक कारक हैं।
फोरम के दौरान राजन ने व्यापक आर्थिक परिदृश्य पर भी बात की। उन्होंने बताया कि वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, महंगाई, और अलग-अलग देशों की आंतरिक नीतियाँ—ये तीन बातें आने वाले वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा तय करेंगी। उन्होंने सुझाव दिया कि भारत को अपनी आर्थिक नीतियों में पारदर्शिता और स्थिरता बनाए रखनी चाहिए ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में देश की विश्वसनीयता बनी रहे।
राजन का यह बयान न केवल भारत–पाकिस्तान संबंधों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि आर्थिक मुद्दों को राजनीतिक बयानबाज़ी से अलग समझना कितना आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि दक्षिण एशिया की स्थिरता बहु-स्तरीय है और इसे केवल तेल, व्यापार या किसी एक नीति निर्णय से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।
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