उद्धव ठाकरे गुट का BJP पर प्रहार, बोला— ‘देशभक्ति का ढोंग बेनकाब’

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शिवसेना के मुखपत्र सामना में संजय राउत ने BJP पर ‘वंदे मातरम्’ मुद्दे को चुनावी खेल बताकर हमला किया. राउत ने BJP के राष्ट्रवाद, इतिहास और मोदी के नेहरू पर आरोपों की कड़ी आलोचना की.

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के मुखपत्र ‘सामना’ में प्रकाशित संजय राउत के ताज़ा संपादकीय ने एक बार फिर महाराष्ट्र और राष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) द्वारा आयोजित कार्यक्रम को निशाना बनाते हुए राउत ने पार्टी को “वंदे मातरम् का ठेकेदार” करार दिया और उस पर राष्ट्रवाद को राजनीतिक हथियार बनाने का आरोप लगाया। उनका यह लेख सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक चर्चा का केंद्र बना हुआ है।

उद्धव ठाकरे गुट का BJP पर प्रहार, बोला— ‘देशभक्ति का ढोंग बेनकाब’
उद्धव ठाकरे गुट का BJP पर प्रहार, बोला— ‘देशभक्ति का ढोंग बेनकाब’

संजय राउत ने अपने संपादकीय में लिखा कि बीजेपी ने लोकसभा में ‘वंदे मातरम्’ पर चर्चा शुरू कराकर खुद के लिए “बड़ी मुसीबत” खड़ी कर ली। राउत के मुताबिक जैसे ही यह मुद्दा सदन में आया, पूरा विपक्ष अचानक संगठित होकर बीजेपी को राष्ट्रवाद पर “झूठा ज्ञान बांटने वाला दल” बताने लगा। उन्होंने कहा कि संसद में उठी इस बहस ने बीजेपी की राजनीति की “दोहरी छवि” को उजागर कर दिया है।

राउत ने सवाल उठाया कि जब देशभक्ति की बात आती है तो बीजेपी तुरंत खुद को केंद्र में क्यों रखती है और अन्य राजनीतिक दलों की राष्ट्रभक्ति पर सवाल क्यों खड़े करती है? उन्होंने लिखा, “वंदे मातरम् देश की आत्मा है, किसी एक राजनीतिक पार्टी की बपौती नहीं। बीजेपी इसे अपने ब्रांड की तरह इस्तेमाल करना चाहती है, लेकिन देश यह दिखावा अब समझ चुका है।”

संपादकीय में उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बीजेपी के कई नेता वर्षों से ‘वंदे मातरम्’ की लाइन में खड़े नहीं दिखे, लेकिन आज वे खुद को इसका “एकमात्र ठेकेदार” घोषित करने में लगे हैं। राउत ने कहा कि बीजेपी ने इस मुद्दे को राजनीतिक मंच बना दिया है, ताकि विरोधियों को राष्ट्रवाद के पैमाने पर कसकर जनता के बीच अपनी छवि मजबूत की जा सके।

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संजय राउत ने संपादकीय में यह भी लिखा कि बीजेपी ने संसद में इस चर्चा को ऐसे समय में उठाया है जब कई महत्वपूर्ण मुद्दे—महंगाई, बेरोजगारी, किसानों से जुड़े प्रश्न और महिलाओं की सुरक्षा—बहस की मांग कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि जनता की समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए ही बीजेपी ‘वंदे मातरम्’ की आड़ में भावनात्मक मुद्दों को हवा देती है। उन्होंने कहा, “जब सरकार जवाबदेही से बचना चाहती है, तब वह ‘राष्ट्रवाद’ की ढाल ले लेती है। यह राजनीतिक रणनीति अब ज्यादा समय तक नहीं टिकने वाली।”

राउत ने इस बहस के दौरान लोकसभा में विपक्ष की एकजुटता की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि जैसे ही ‘वंदे मातरम्’ पर चर्चा शुरू हुई, कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके, वाम दल और कई अन्य विपक्षी पार्टी सांसद एक सुर में बीजेपी पर हमलावर हो गए। उन्होंने कहा कि विपक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी पर राष्ट्रवाद की गलत व्याख्या करने और इसे वोट बैंक की राजनीति में बदलने का आरोप लगाया।

‘सामना’ में प्रकाशित लेख में राउत ने आगे कहा कि ‘वंदे मातरम्’ सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संघर्ष का प्रतीक है। उन्होंने लिखा कि जिन लोगों ने वर्षों तक इस गीत की आलोचना की या इससे दूरी बनाई, वही लोग आज इसे अपने राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बना रहे हैं। राउत के अनुसार यह विरोधाभास बीजेपी की नीति और नीयत दोनों पर सवाल खड़े करता है।

उन्होंने यह भी कहा कि महाराष्ट्र की जनता राजनीति और राष्ट्रवाद के बीच फर्क समझती है। उन्होंने लिखा कि ‘वंदे मातरम्’ की वर्षगांठ एक सांस्कृतिक उत्सव होना चाहिए था, लेकिन इसे बीजेपी ने “राजनीतिक तमाशा” में बदल दिया है। राउत के शब्दों में, “देशभक्ति का अर्थ सिर्फ नारा लगाना नहीं होता, बल्कि संविधान और लोकतंत्र के मूल्यों की रक्षा करना होता है।”

राउत के इस संपादकीय के बाद महाराष्ट्र और राष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छिड़ गई है। बीजेपी नेताओं ने राउत के आरोपों को “बेमानी और राजनीतिक हताशा” का परिणाम बताया। वहीं, उद्धव ठाकरे गुट और उसके सहयोगी दलों का कहना है कि राउत ने जो कहा, वह जनता की सोच को प्रतिबिंबित करता है।

इस पूरे विवाद ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि ‘वंदे मातरम्’ जैसा ऐतिहासिक और भावनात्मक मुद्दा भारतीय राजनीति में कितना संवेदनशील और असरदार है—और साथ ही यह भी कि इसे लेकर राजनीतिक टकराव कितनी आसानी से भड़क सकता है।

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