चंद्रशेखर आजाद की मांग—“देशभर में बने मासिक धर्म अवकाश नीति”

आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के नेता चंद्रशेखर आजाद ने गुरुवार (11 दिसंबर 2025) को लोकसभा में मासिक धर्म अवकाश को लेकर राष्ट्रीय नीति की मांग उठाई है.

लोकसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान महिलाओं के स्वास्थ्य और अधिकारों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मुद्दा जोरदार तरीके से सामने आया। उत्तर प्रदेश की नगीना लोकसभा सीट से सांसद और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने गुरुवार, 11 दिसंबर 2025 को मासिक धर्म अवकाश पर राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि भारत में करोड़ों महिलाएँ, खासकर असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली, इस दौरान कई चुनौतियों का सामना करती हैं, लेकिन उनके लिए कोई समग्र नीति नहीं है।

चंद्रशेखर आजाद की मांग—“देशभर में बने मासिक धर्म अवकाश नीति”
चंद्रशेखर आजाद की मांग—“देशभर में बने मासिक धर्म अवकाश नीति”

चंद्रशेखर आजाद ने शून्यकाल में बोलते हुए कहा कि देश में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने और उनके स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील नीतियाँ बनाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि मासिक धर्म के दौरान कई महिलाएँ शारीरिक असुविधा, दर्द और कमजोरी का सामना करती हैं, लेकिन मजबूरी में उन्हें काम पर जाना पड़ता है। ऐसे में सरकार को एक राष्ट्रीय फ्रेमवर्क बनाना चाहिए, जिससे महिलाओं को गरिमा के साथ काम करने का अधिकार मिल सके।

“भारत में राष्ट्रीय नीति नहीं, जबकि कई देशों में व्यवस्था मौजूद”

सांसद चंद्रशेखर ने कहा कि आज भी भारत में मासिक धर्म अवकाश को लेकर कोई समग्र राष्ट्रीय नीति नहीं है। कुछ निजी संस्थाएँ और कुछ राज्य आंशिक रूप से ऐसी सुविधाएँ देते हैं, लेकिन यह पूरे देश में एकरूपता से लागू नहीं है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जापान, इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया, ताइवान, जाम्बिया जैसे देशों में वर्षों से पीरियड लीव नीति मौजूद है। वहाँ महिलाओं को दर्द और असुविधा के दौरान काम से छुट्टी मिलती है, और यह उनके स्वास्थ्य अधिकारों का हिस्सा माना जाता है।
उन्होंने कहा—“अगर अन्य देश महिलाओं के लिए ऐसे संवेदनशील कदम उठा सकते हैं, तो दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था भारत को भी यह पहल करनी चाहिए।”

असंगठित क्षेत्र की महिलाओं का मुद्दा उठाया

चंद्रशेखर आजाद ने विशेष रूप से असंगठित क्षेत्र की महिलाओं की दुश्वारियों पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि देश में लगभग 80–90 प्रतिशत महिलाएँ असंगठित क्षेत्र में काम करती हैं, जिनमें घरेलू कामगार, खेत मजदूर, रिक्शा–खोमचा चलाने वाली महिलाएँ, छोटे दुकानों और कार्यस्थलों पर काम करने वाली कर्मचारी शामिल हैं। इन महिलाओं को न तो छुट्टियाँ मिलती हैं, न ही चिकित्सा सुविधाएँ, और न ही पीरियड के समय किसी तरह की राहत।

उन्होंने कहा कि मासिक धर्म जैसे प्राकृतिक चक्र को “टैबू” या “साइलेंट इश्यू” मानकर अनदेखा नहीं किया जा सकता। यह महिलाओं के स्वास्थ्य, गरिमा और श्रम अधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है।

सरकार से बनाई जाए व्यापक-मित्रवत नीति: आजाद

सांसद ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि:

  • मासिक धर्म अवकाश को लेकर एक राष्ट्रीय नीति बनाई जाए।
  • नीति में असंगठित क्षेत्र की महिला श्रमिकों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए।
  • पीरियड लीव को स्वास्थ्य अधिकार के रूप में मान्यता दी जाए।
  • पीरियड संबंधित समस्याओं को लेकर जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएँ।
  • कार्यस्थलों पर महिलाओं के लिए आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध करवाई जाएँ, जैसे स्वच्छ वॉशरूम, सैनिटरी पैड, आराम के लिए व्यवस्था आदि।

उन्होंने कहा कि इस नीति से न केवल महिलाओं के स्वास्थ्य में सुधार होगा बल्कि उनके कार्य प्रदर्शन, आत्मविश्वास और सामाजिक सहभागिता में भी वृद्धि होगी।

सदन में गूँजी महिला स्वास्थ्य की चिंता, सरकार पर बढ़ा दबाव

सदन में गूँजी महिला स्वास्थ्य की चिंता, सरकार पर बढ़ा दबाव
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चंद्रशेखर आजाद की यह पहल सोशल और राजनीतिक स्तर पर चर्चा का विषय बन गई है। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों की महिला सांसदों ने इस मुद्दे को समर्थन दिया है। कई सांसदों ने कहा कि भारत में पीरियड लीव नीति पर गंभीर विमर्श की जरूरत है, क्योंकि यह सिर्फ अवकाश का मुद्दा नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण का मूल तत्व है।

संसद में यह मुद्दा उठने के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि केंद्र सरकार इस विषय पर सकारात्मक कदम उठा सकती है या संबंधित मंत्रालय इसे लेकर विस्तृत अध्ययन और मसौदा तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

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