शिवसेना (यूबीटी) सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने मनरेगा का नाम बदलने की रिपोर्टों पर केंद्र सरकार की आलोचना की. वहीं एयर पॉल्यूशन के मुद्दे पर चर्चा की जरूरत पर जोर दिया.
शिवसेना (यूबीटी) की राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) का नाम बदलकर ‘पूज्य बापू ग्रामीण रोजगार योजना’ किए जाने की संभावित रिपोर्टों को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने इस कदम को जनता को गुमराह करने वाला बताते हुए कहा कि सरकार असली और ज्वलंत मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए ऐसे प्रतीकात्मक फैसलों का सहारा ले रही है। प्रियंका चतुर्वेदी का कहना है कि देश इस समय बेरोज़गारी, महंगाई और ग्रामीण संकट जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है, लेकिन सरकार इन पर ठोस जवाब देने के बजाय नाम बदलने जैसी चर्चाओं को हवा दे रही है।

प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि मनरेगा सिर्फ एक योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत के करोड़ों गरीब परिवारों के लिए जीवनरेखा है। यह योजना आर्थिक संकट, प्राकृतिक आपदाओं और महामारी जैसे कठिन समय में लोगों को न्यूनतम आय और सम्मानजनक रोज़गार उपलब्ध कराती रही है। ऐसे में योजना के नाम को लेकर विवाद खड़ा करना यह दिखाता है कि सरकार की प्राथमिकताएं जमीनी समस्याओं से कटती जा रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की हताशा अब साफ नजर आने लगी है और इसी हताशा के चलते ऐसे फैसले लिए जा रहे हैं।
शिवसेना (यूबीटी) सांसद ने कहा कि जब सरकार के पास बेरोज़गारी, किसानों की आय, ग्रामीण मजदूरी में गिरावट और मनरेगा के तहत लंबित भुगतान जैसे मुद्दों पर जवाब नहीं होते, तब ध्यान भटकाने के लिए प्रतीकात्मक बदलाव सामने लाए जाते हैं। उनके मुताबिक, मनरेगा में काम के दिनों में कटौती, मजदूरी भुगतान में देरी और बजट आवंटन में कमी जैसे सवालों पर सरकार को जवाब देना चाहिए, न कि नाम बदलने की चर्चाओं से माहौल बनाना चाहिए।

प्रियंका चतुर्वेदी ने इस मुद्दे को गांधी परिवार और महात्मा गांधी के योगदान से भी जोड़ते हुए कहा कि मनरेगा का नाम महात्मा गांधी के नाम पर रखा जाना सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि वैचारिक और ऐतिहासिक महत्व भी रखता है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह के फैसले गांधी परिवार और महात्मा गांधी के योगदान के प्रति असम्मान को दर्शाते हैं। उनके अनुसार, महात्मा गांधी के नाम पर बनी योजना को कमजोर करने या उसकी पहचान बदलने की कोशिश दरअसल उस विचारधारा पर हमला है, जो ग्रामीण आत्मनिर्भरता और सामाजिक न्याय की बात करती है।
उन्होंने यह भी कहा कि सरकार बार-बार योजनाओं के नाम बदलकर यह दिखाने की कोशिश करती है कि वह कुछ नया कर रही है, जबकि जमीनी हकीकत में नीतियों के क्रियान्वयन में गंभीर खामियां बनी हुई हैं। प्रियंका के मुताबिक, जनता अब समझने लगी है कि नाम बदलने से न तो रोज़गार बढ़ता है और न ही लोगों की आमदनी में सुधार होता है। असली जरूरत यह है कि मनरेगा को मजबूत किया जाए, मजदूरी समय पर दी जाए और काम के अवसर बढ़ाए जाएं।
प्रियंका चतुर्वेदी ने केंद्र सरकार से अपील की कि वह प्रतीकात्मक राजनीति से बाहर निकलकर वास्तविक मुद्दों पर ध्यान दे। उन्होंने कहा कि ग्रामीण भारत आज संकट के दौर से गुजर रहा है और मनरेगा जैसी योजनाओं को कमजोर करने के बजाय और सशक्त करने की जरूरत है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि जनता को नामों से नहीं, नीतियों और उनके परिणामों से फर्क पड़ता है।
गौरतलब है कि हाल के दिनों में मनरेगा का नाम बदलने को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज हुई हैं, हालांकि सरकार की ओर से इस पर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। इसके बावजूद विपक्ष इस मुद्दे को लेकर हमलावर है और इसे सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करने के तौर पर देख रहा है। प्रियंका चतुर्वेदी का बयान इसी राजनीतिक बहस को और तेज करता नजर आ रहा है।