बांके बिहारी मंदिर पर CJI की सख्त टिप्पणी, VIP संस्कृति पर तंज !

सीजेआई सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता से पूछा कि अगर मंदिर में दर्शन की टाइमिंग बढ़ाई जाती है तो उसमें परेशानी की क्या बात है.

वृंदावन स्थित प्रसिद्ध श्री बांके बिहारी मंदिर में वीआईपी दर्शन और विशेष पूजा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि मंदिर में इस तरह की व्यवस्था के चलते देवता को विश्राम करने का अवसर तक नहीं मिल पा रहा है। कोर्ट ने यह भी कहा कि जब आम श्रद्धालुओं के लिए दर्शन बंद रहते हैं, उस समय मोटी फीस अदा करने वालों के लिए विशेष पूजा और दर्शन कराए जाते हैं, जो समानता और आस्था के मूल सिद्धांतों के विपरीत प्रतीत होता है।

बांके बिहारी मंदिर पर CJI की सख्त टिप्पणी, VIP संस्कृति पर तंज !
बांके बिहारी मंदिर पर CJI की सख्त टिप्पणी, VIP संस्कृति पर तंज !

यह टिप्पणी भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचौली की पीठ ने सुनवाई के दौरान की। पीठ मंदिर के सेवायतों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त हाई पावर्ड कमेटी के निर्देशों का विरोध किया गया है। इस कमेटी ने आम श्रद्धालुओं के हित में मंदिर में दर्शन का समय बढ़ाने की सिफारिश की है।

बांके बिहारी मंदिर पर CJI की सख्त टिप्पणी, VIP संस्कृति पर तंज !
बांके बिहारी मंदिर पर CJI की सख्त टिप्पणी, VIP संस्कृति पर तंज !

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि धार्मिक आस्था का अर्थ केवल रस्मों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें समानता और व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। पीठ ने स्पष्ट किया कि देवता की सेवा के नाम पर ऐसी व्यवस्थाएं नहीं होनी चाहिए, जिनसे आम भक्तों के अधिकार प्रभावित हों। कोर्ट की टिप्पणी में यह भी संकेत मिला कि वीआईपी संस्कृति ने धार्मिक स्थलों की मूल भावना को कहीं न कहीं कमजोर किया है।

मामले की सुनवाई के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने हाई पावर्ड कमेटी को नोटिस जारी किया है और स्पष्ट किया है कि जनवरी में इस याचिका पर विस्तार से सुनवाई की जाएगी। अदालत ने फिलहाल किसी भी अंतिम निर्णय से परहेज करते हुए सभी पक्षों की दलीलें सुनने की आवश्यकता पर जोर दिया।

याचिका में श्री बांके बिहारी जी मंदिर ट्रस्ट अध्यादेश, 2025 को चुनौती दी गई है। मंदिर के सेवाधिकारियों का कहना है कि इस अध्यादेश के जरिए सरकार मंदिर के प्रबंधन में हस्तक्षेप कर रही है, जो परंपराओं के खिलाफ है। सेवायतों का तर्क है कि श्री बांके बिहारी मंदिर का संचालन और प्रबंधन वर्ष 1939 में बनी एक विशेष योजना के तहत होता आ रहा है और उसी व्यवस्था के अनुसार आज तक मंदिर का संचालन किया जाता रहा है।

सेवाधिकारियों का कहना है कि मंदिर की परंपराएं विशिष्ट हैं और इन्हें सामान्य प्रशासनिक नियमों से नहीं जोड़ा जा सकता। उनका दावा है कि दर्शन और पूजा की समय-सारिणी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है, जिसमें बाहरी हस्तक्षेप से आस्था पर असर पड़ सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर का प्रबंधन पूरी तरह धार्मिक प्रकृति का है और उस पर सरकार का सीधा अधिकार नहीं बनता।

वहीं दूसरी ओर, कमेटी और अन्य पक्षों का कहना है कि लाखों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस मंदिर में दर्शन की व्यवस्था अधिक पारदर्शी और समान होनी चाहिए। उनका तर्क है कि सीमित समय और वीआईपी दर्शन की वजह से आम श्रद्धालुओं को घंटों कतार में खड़ा रहना पड़ता है या कई बार दर्शन के बिना लौटना पड़ता है। ऐसे में दर्शन का समय बढ़ाना और विशेष सुविधाओं पर नियंत्रण जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने इस बहस को और तेज कर दिया है कि धार्मिक स्थलों पर वीआईपी संस्कृति की सीमा क्या होनी चाहिए। अदालत ने साफ संकेत दिया है कि आस्था के साथ-साथ देवता की गरिमा और आम भक्तों के अधिकारों की भी रक्षा की जानी चाहिए।

अब सभी की निगाहें जनवरी में होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि मंदिर प्रबंधन, सरकार और अदालत के निर्देशों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा। यह मामला न केवल श्री बांके बिहारी मंदिर की व्यवस्था से जुड़ा है, बल्कि देशभर के धार्मिक स्थलों में दर्शन और वीआईपी संस्कृति को लेकर एक बड़ी मिसाल भी बन सकता है।

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