अनुज चौधरी मामले में नया मोड़, CJM के आदेश पर संभल पुलिस असहमत !

फिरोजाबाद में तैनात सीओ अनुज चौधरी के खिलाफ सीजेएम कोर्ट ने प्राथमिकी दाखिल करने का आदेश दिया था. अब इस पर संभल एसपी के बयान से अलग संकेत मिल रहे हैं.

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में वर्ष 2024 में हुई हिंसा से जुड़े एक मामले ने एक बार फिर प्रशासन और न्यायपालिका के बीच टकराव की स्थिति पैदा कर दी है। चंदौसी स्थित मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (सीजेएम) की अदालत ने इस मामले में तत्कालीन पुलिस क्षेत्राधिकारी (सीओ) अनुज चौधरी, तत्कालीन कोतवाली प्रभारी अनुज तोमर और कुछ अज्ञात पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने का आदेश दिया है। हालांकि, इस आदेश के बावजूद संभल पुलिस ने फिलहाल एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया है और अदालत के आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती देने का ऐलान किया है।

अनुज चौधरी मामले में नया मोड़, CJM के आदेश पर संभल पुलिस असहमत !
अनुज चौधरी मामले में नया मोड़, CJM के आदेश पर संभल पुलिस असहमत !

संभल के पुलिस अधीक्षक (एसपी) कृष्ण कुमार बिश्नोई ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पुलिस प्रशासन अदालत के आदेश के खिलाफ अपील दायर करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि मामले में पहले ही न्यायिक जांच हो चुकी है, ऐसे में दोबारा एफआईआर दर्ज करने का कोई औचित्य नहीं बनता। एसपी ने कहा, “हम न्यायालय के आदेश को सक्षम न्यायालय में चुनौती देंगे और जब तक उच्च अदालत से कोई निर्देश नहीं आता, तब तक प्राथमिकी दर्ज नहीं की जाएगी।”

पुलिस प्रशासन की इस मंशा को लेकर संभल पुलिस के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से भी बयान जारी किया गया। सोशल मीडिया साइट ‘एक्स’ पर किए गए पोस्ट में लिखा गया कि न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश के विरुद्ध सक्षम न्यायालय में अपील की जाएगी। इस बयान के बाद मामला और अधिक चर्चा में आ गया है और कानूनी व राजनीतिक हलकों में इस पर बहस शुरू हो गई है।

क्या है पूरा मामला

दरअसल, यह मामला संभल में नवंबर 2024 में हुई हिंसा से जुड़ा हुआ है। मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी विभांशु सुधीर ने नौ जनवरी को यह आदेश उस याचिका पर पारित किया था, जो हिंसा में घायल हुए एक युवक के पिता द्वारा दायर की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि पुलिस फायरिंग में उनके बेटे को गोली लगी थी और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए।

क्या है पूरा मामला
क्या है पूरा मामला

शिकायतकर्ता यामीन, जो नखासा थाना क्षेत्र के खग्गू सराय इलाके का निवासी है, ने अदालत में बताया कि उसका 24 वर्षीय बेटा आलम 24 नवंबर 2024 को पापड़ बेचने के लिए घर से निकला था। यामीन के अनुसार, उसी दौरान शाही जामा मस्जिद के पास पुलिसकर्मियों ने उसके बेटे पर गोली चला दी, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया। याचिका में यह भी कहा गया कि घटना के बाद पुलिस ने न तो उचित कार्रवाई की और न ही दोषी अधिकारियों के खिलाफ कोई कदम उठाया गया।

याचिकाकर्ता का आरोप है कि पुलिस ने अपने ही कर्मियों को बचाने के लिए पूरे मामले को दबाने की कोशिश की और पीड़ित परिवार को न्याय के लिए अदालत की शरण लेनी पड़ी। इसी आधार पर सीजेएम अदालत ने प्रथम दृष्टया आरोपों को गंभीर मानते हुए तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी, कोतवाली प्रभारी अनुज तोमर और अज्ञात पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया।

पुलिस का पक्ष

वहीं, पुलिस प्रशासन का कहना है कि इस मामले की पहले ही न्यायिक जांच हो चुकी है और जांच में जो तथ्य सामने आए, उनके आधार पर कार्रवाई की गई थी। एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई के अनुसार, अदालत के आदेश में कई तथ्यों की अनदेखी की गई है, इसलिए इसे उच्च अदालत में चुनौती देना जरूरी है। उन्होंने कहा कि कानून के तहत पुलिस को भी अपील करने का अधिकार है और उसी अधिकार का प्रयोग किया जा रहा है।

बढ़ी सियासी और कानूनी हलचल

इस मामले के सामने आने के बाद प्रदेश में एक बार फिर पुलिस कार्रवाई और जवाबदेही को लेकर सवाल उठने लगे हैं। विपक्षी दल इसे कानून-व्यवस्था और पुलिस की कार्यप्रणाली से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि पुलिस प्रशासन का कहना है कि वह कानून के दायरे में रहकर ही आगे की कार्रवाई करेगा।

फिलहाल, सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि उच्च न्यायालय इस मामले में क्या रुख अपनाता है। यदि अदालत सीजेएम के आदेश को बरकरार रखती है, तो संभल पुलिस को एफआईआर दर्ज करनी पड़ेगी। वहीं, अगर पुलिस की अपील स्वीकार होती है, तो मामला एक बार फिर कानूनी पेचीदगियों में उलझ सकता है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि पुलिस और न्यायपालिका के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए, ताकि पीड़ितों को समय पर न्याय मिल सके।

Also Read :

निर्यात के मोर्चे पर यूपी की बड़ी छलांग, देश में चौथा स्थान हासिल !