बलिया से सपा सांसद सनातन पांडे ने विवादास्पद बयान दिया है। उन्होंने बीजेपी सरकार के मंत्री के साथ ही अधिकारियों को भी धमकाया।
उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में एक सरकारी कार्यक्रम उस समय विवाद का केंद्र बन गया, जब समाजवादी पार्टी (सपा) के सांसद सनातन पांडेय ने खुले मंच से बेहद आपत्तिजनक और आक्रामक बयान दे दिया। रेल प्रशासन की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि न बनाए जाने से नाराज सांसद ने यूपी सरकार के आयुष मंत्री दयाशंकर उर्फ दयालु मिश्र को लेकर ऐसी टिप्पणी की, जिसने राजनीतिक हलकों में हड़कंप मचा दिया है। उनके बयान का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसके बाद सियासी बयानबाजी भी तेज हो गई है।

जानकारी के मुताबिक, बलिया में रेलवे से जुड़े एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि यूपी सरकार के आयुष मंत्री दयाशंकर मिश्र को आमंत्रित किया गया था, जबकि बलिया से सांसद होने के बावजूद सपा सांसद सनातन पांडेय को यह भूमिका नहीं दी गई। इसी बात से नाराज होकर सांसद का गुस्सा मंच पर ही फूट पड़ा। उन्होंने अपने भाषण के दौरान मंत्री और प्रशासन दोनों पर निशाना साधा।
मंच से बोलते हुए सपा सांसद ने कहा, “मैं बूढ़ा जरूर हूं, लेकिन मन का बूढ़ा नहीं हूं। मन करता है कि जाकर मंत्री को मंच से उठाकर नीचे फेंक दूं।” इस बयान के बाद कार्यक्रम स्थल पर कुछ देर के लिए असहज स्थिति पैदा हो गई। मंच पर मौजूद अन्य नेताओं और अधिकारियों ने माहौल संभालने की कोशिश की, लेकिन तब तक सांसद का बयान चर्चा का विषय बन चुका था।
सपा सांसद की इस टिप्पणी को राजनीतिक मर्यादा के खिलाफ बताया जा रहा है। विपक्षी दलों के साथ-साथ सत्तारूढ़ भाजपा ने भी इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है। भाजपा नेताओं का कहना है कि एक जनप्रतिनिधि से इस तरह की भाषा और व्यवहार की उम्मीद नहीं की जा सकती। पार्टी नेताओं ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताया और सपा नेतृत्व से सांसद के बयान पर कार्रवाई की मांग की।
वहीं, सपा के कुछ नेताओं ने इस पूरे घटनाक्रम को प्रशासनिक अपमान से जोड़कर देखा है। उनका कहना है कि एक निर्वाचित सांसद को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं है और इसी वजह से भावनाओं में आकर सांसद ने ऐसा बयान दे दिया। हालांकि पार्टी की ओर से अब तक इस बयान को लेकर कोई आधिकारिक सफाई या खंडन सामने नहीं आया है, लेकिन अंदरखाने इसे पार्टी के लिए असहज स्थिति माना जा रहा है।
इस घटना ने एक बार फिर राजनीतिक शिष्टाचार और सार्वजनिक मंचों पर नेताओं की भाषा को लेकर बहस छेड़ दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चुनावी माहौल के करीब आते ही नेताओं की बयानबाजी तेज और आक्रामक होती जा रही है। लेकिन इस तरह की धमकी भरी भाषा न केवल राजनीतिक माहौल को विषाक्त करती है, बल्कि आम जनता के बीच गलत संदेश भी देती है।
घटना के बाद स्थानीय प्रशासन भी सतर्क नजर आ रहा है। सूत्रों के अनुसार, कार्यक्रम में मौजूद अधिकारियों ने पूरे मामले की रिपोर्ट तैयार की है। अगर सांसद के बयान को लेकर औपचारिक शिकायत दर्ज होती है, तो कानूनी पहलुओं पर भी विचार किया जा सकता है। हालांकि अभी तक किसी तरह की एफआईआर या नोटिस की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
सोशल मीडिया पर इस बयान को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ लोग सांसद के गुस्से को व्यक्तिगत अपमान का नतीजा बता रहे हैं, तो वहीं बड़ी संख्या में लोग इसे गैर-जिम्मेदाराना और निंदनीय करार दे रहे हैं। कई यूजर्स ने सवाल उठाया है कि अगर जनप्रतिनिधि ही इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करेंगे, तो आम जनता से संयम की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
कुल मिलाकर, बलिया का यह मामला अब सिर्फ एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह प्रदेश की राजनीति में एक नए विवाद का रूप ले चुका है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सपा नेतृत्व इस बयान पर क्या रुख अपनाता है और क्या सांसद अपने शब्दों को लेकर कोई सफाई या माफी देते हैं। फिलहाल, यह विवाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में गरमाहट बढ़ाने वाला साबित हो रहा है।