सपा–कांग्रेस का आरोप, अविमुक्तेश्वरानंद के सहारे BJP की घेराबंदी !

 माघ मेले में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और उनके बटुकों के साथ प्रशासन और पुलिस की बहस के बाद अब तक सियासत थमती नहीं दिख रही है. अब बात बीजेपी में फूट तक पहुंच गई है.

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में माघ मेले के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्यों (बटुकों) के साथ हुई प्रशासनिक कहासुनी अब बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुकी है। इस प्रकरण को लेकर सत्ता और विपक्ष के बीच सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। जहां एक ओर सरकार के भीतर अलग-अलग नेताओं के बयानों को लेकर चर्चा है, वहीं विपक्ष इसे 2027 के विधानसभा चुनाव से जोड़कर बीजेपी में फूट का दावा कर रहा है।

सपा–कांग्रेस का आरोप, अविमुक्तेश्वरानंद के सहारे BJP की घेराबंदी !
सपा–कांग्रेस का आरोप, अविमुक्तेश्वरानंद के सहारे BJP की घेराबंदी !

इस मामले में पहले उप मुख्यमंत्री Keshav Prasad Maurya ने प्रशासनिक कार्रवाई की बात कही थी। इसके बाद उप मुख्यमंत्री Brajesh Pathak का बयान सामने आया, जिसमें उन्होंने बटुकों के साथ हुई कथित बदसलूकी पर नाराजगी जाहिर की। इसी दौरान बटुकों द्वारा ब्रजेश पाठक को मुख्यमंत्री बनने का आशीर्वाद देने की घटना ने राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दे दी। विपक्ष ने इसे बीजेपी के भीतर नेतृत्व संघर्ष से जोड़ते हुए बड़ा मुद्दा बना लिया है।

2027 चुनाव की जमीन तैयार करने की कोशिश

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बहाने विपक्षी दलों का आरोप है कि बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के बीच मतभेद उभरकर सामने आ रहे हैं। मुख्यमंत्री Yogi Adityanath, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के अलग-अलग बयानों का हवाला देते हुए सपा और कांग्रेस यह दावा कर रही हैं कि इस मुद्दे पर पार्टी के भीतर एक राय नहीं है। विपक्ष का कहना है कि बीजेपी के ये अंतर्विरोध 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उसकी मुश्किलें बढ़ा सकते हैं।

सपा-कांग्रेस का हमला

सपा-कांग्रेस का हमला
सपा-कांग्रेस का हमला

समाजवादी पार्टी की विधायक Ragini Sonkar ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि बीजेपी धर्म और जाति के आधार पर राजनीति कर रही है और विकास के मूल मुद्दों से जनता का ध्यान भटका रही है। उन्होंने दावा किया कि बीजेपी की अंदरूनी गुटबाजी जनता के लिए अच्छी है, क्योंकि 2027 में पार्टी का सफाया तय है। बटुकों द्वारा ब्रजेश पाठक को मुख्यमंत्री बनने का आशीर्वाद दिए जाने को उन्होंने आपसी खींचतान का परिणाम बताया।

कांग्रेस विधायक Aradhana Mishra ने भी इस पूरे घटनाक्रम को बीजेपी में असहमति का संकेत बताया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब मुख्यमंत्री कुछ कहते हैं और उनके डिप्टी सीएम उससे अलग बयान देते हैं, तो यह साफ तौर पर नेतृत्व संकट को दर्शाता है। उन्होंने बीजेपी से स्पष्ट करने को कहा कि आगामी चुनाव में मुख्यमंत्री का चेहरा कौन होगा—योगी आदित्यनाथ, ब्रजेश पाठक या केशव प्रसाद मौर्य।

समाजवादी पार्टी के नेता Sangram Singh Yadav ने ब्रजेश पाठक के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यदि उप मुख्यमंत्री को लगता है कि शंकराचार्य के साथ गलत व्यवहार हुआ है, तो उन्हें पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी पर अहंकार में सत्ता चलाने का आरोप भी लगाया।

सत्ता पक्ष का पलटवार

विपक्ष के आरोपों पर योगी सरकार के मंत्री Narendra Kashyap ने गुटबाजी के दावों को सिरे से खारिज किया। उन्होंने ब्रजेश पाठक के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि बटुकों की चुटिया खींचना निश्चित रूप से पाप है और जिन्होंने ऐसा किया है, उन्हें भगवान सजा देगा। मुख्यमंत्री बनने के आशीर्वाद वाले मुद्दे पर उन्होंने कहा कि भावनाओं में लोग किसी के लिए दुआ कर देते हैं, लेकिन मुख्यमंत्री कौन बनेगा, यह बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व तय करता है।

निषाद पार्टी के नेता Sanjay Nishad ने भी बीजेपी में गुटबाजी के आरोपों को नकारते हुए कहा कि धार्मिक सम्मान और कानून व्यवस्था दो अलग विषय हैं। उन्होंने कहा कि धर्मगुरुओं का सम्मान होना चाहिए, लेकिन राजनीति और धर्म को आपस में नहीं मिलाया जाना चाहिए।

सीएम योगी और अखिलेश आमने-सामने

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस प्रकरण पर विधानसभा में स्पष्ट किया था कि कानून सभी के लिए समान है और कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है। उन्होंने विपक्ष पर पलटवार करते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी की सरकार में संबंधित संत पर लाठीचार्ज हुआ था और आज वही लोग नैतिकता की बात कर रहे हैं।

इस पर सपा प्रमुख Akhilesh Yadav ने मुख्यमंत्री पर तीखा हमला किया था। उन्होंने योगी के बयान को शाब्दिक हिंसा बताते हुए कहा कि शंकराचार्य के बारे में अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल पाप है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर उन्होंने लिखा था कि चाहे कोई कितना भी चोला पहन ले, उसकी वाणी उसकी सच्चाई उजागर कर देती है।

सियासत का केंद्र बना माघ मेला प्रकरण

कुल मिलाकर, माघ मेले से जुड़ा यह विवाद अब धार्मिक आस्था से निकलकर पूरी तरह राजनीतिक अखाड़ा बन चुका है। विपक्ष जहां इसे 2027 के चुनाव की रणनीति से जोड़कर बीजेपी पर दबाव बना रहा है, वहीं सत्तापक्ष इसे विपक्ष की राजनीतिक चाल बता रहा है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और कितना तूल पकड़ता है, इस पर प्रदेश की राजनीति की दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी।

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