पोस्टरों ने छीड़ा सियासी तंज—दिल्ली को याद आए केजरीवाल !

आप ने बीजेपी पर हमला बोलते हुए दावा किया है कि लोग केजरीवाल सरकार के शिक्षा, स्वास्थ्य और बिजली-पानी के मॉडल को याद कर रहे हैं. अब मोहल्ला क्लीनिक सुस्त पड़े हैं, अस्पतालों में भीड़ और जाम बढ़ गया है.

दिल्ली की सियासत में एक साल के भीतर तस्वीर कितनी बदल गई है, यह अब सिर्फ राजनीतिक बहसों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि सड़कों, होर्डिंग्स और आम लोगों की बातचीत में भी साफ दिखाई देने लगी है। हाल ही में आम आदमी पार्टी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जो बातें कहीं, वे केवल विपक्ष का आरोप भर नहीं थीं, बल्कि राजधानी की मौजूदा जमीनी हकीकत की ओर इशारा करती नजर आईं।

पोस्टरों ने छीड़ा सियासी तंज—दिल्ली को याद आए केजरीवाल !
पोस्टरों ने छीड़ा सियासी तंज—दिल्ली को याद आए केजरीवाल !

उनका कहना था कि दिल्ली में एक साल के भीतर ही हालात ऐसे बन गए हैं कि लोगों को पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की याद आने लगी है।

सौरभ भारद्वाज ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत ही तंज के साथ की। उन्होंने बताया कि कॉन्फ्रेंस एक घंटे देरी से शुरू हुई, जिसके लिए उन्होंने दिल्ली और केंद्र सरकार का “धन्यवाद” दिया। उनका कहना था कि पिछले तीन दिनों से मध्य दिल्ली में ऐसा भीषण ट्रैफिक जाम है कि टैक्सी ड्राइवर उस इलाके में आने से मना कर रहे हैं। भारद्वाज ने इसे राजधानी की बदहाल यातायात व्यवस्था का उदाहरण बताते हुए कहा कि यह वही दिल्ली है, जो कभी बेहतर ट्रैफिक मैनेजमेंट और योजनाबद्ध सड़कों के लिए जानी जाती थी।

उन्होंने कहा कि 2025 से पहले आम आदमी पार्टी की सरकार के दौरान दिल्ली ने शिक्षा, स्वास्थ्य और बिजली-पानी के क्षेत्र में एक अलग तरह का मॉडल देखा था। मोहल्ला क्लीनिक गरीब और मध्यम वर्ग के लिए इलाज का सबसे आसान और भरोसेमंद विकल्प बने थे। सरकारी स्कूलों के नतीजे और इंफ्रास्ट्रक्चर इतने बेहतर हुए कि उनकी चर्चा देश ही नहीं, विदेशों तक में होने लगी। बिजली के बिलों में राहत मिली, पानी की सप्लाई में सुधार हुआ और आम लोगों को यह एहसास हुआ कि सरकार उनके दरवाजे तक पहुंच रही है।

सौरभ भारद्वाज ने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार के एक साल पूरे होने पर जब दिल्ली में होर्डिंग्स लगे—“एक साल, दिल्ली बेहाल, याद आ रहे केजरीवाल”—तो उनमें किसी नेता की तस्वीर नहीं थी। न प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फोटो, न ही मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का। सिर्फ एक सीधा संदेश था, जो जनता की भावना को दर्शाता है। भारद्वाज ने सवाल उठाया कि अगर सरकार के कामकाज से सब संतुष्ट हैं, तो फिर एक नाम से इतना डर क्यों?

उन्होंने आगे कहा कि आज दिल्ली की गलियों में लोग रोजमर्रा की समस्याओं से जूझ रहे हैं। मोहल्ला क्लीनिक या तो बंद पड़े हैं या उनकी रफ्तार सुस्त हो गई है। सरकारी अस्पतालों में मरीजों की लंबी कतारें फिर से आम हो गई हैं। स्कूलों में पहले जैसी ऊर्जा और सुधार नजर नहीं आता। सड़कों पर जाम अब अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य स्थिति बन चुकी है। प्रदूषण का स्तर कम होने के बजाय कई बार और बढ़ जाता है। कई इलाकों में पानी की सप्लाई बाधित रहती है और सफाई व्यवस्था को लेकर लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं।

पोस्टरों ने छीड़ा सियासी तंज—दिल्ली को याद आए केजरीवाल !
पोस्टरों ने छीड़ा सियासी तंज—दिल्ली को याद आए केजरीवाल !

भारद्वाज ने कहा कि फरवरी 2025 से पहले की सरकार में अरविंद केजरीवाल का नाम एक ऐसे नेता के तौर पर लिया जाता था, जिसने राजनीति की भाषा बदली। उन्होंने “वोट” की जगह “काम” की बात की। स्कूल सुधरे, क्लीनिक खुले और बुनियादी सुविधाओं में आम लोगों को राहत मिली। यही वजह है कि जब आज परेशानियां बढ़ती दिखती हैं, तो लोगों को वह दौर याद आता है।

उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली की जनता भावनाओं से ज्यादा अपने रोजमर्रा के अनुभवों के आधार पर फैसला करती है। अगर सुबह घर में पानी नहीं आता, बच्चे को स्कूल में पहले जैसा माहौल नहीं मिलता, क्लीनिक में डॉक्टर नहीं होता और सड़क पर घंटों जाम में फंसे रहना पड़ता है, तो नाराजगी स्वाभाविक है। यही नाराजगी अब पोस्टरों, होर्डिंग्स और चर्चाओं में झलकने लगी है।

सौरभ भारद्वाज के मुताबिक, एक साल का शासन केवल सत्ता में बने रहने का नाम नहीं होता, बल्कि यह दिखाने का वक्त होता है कि जनता का जीवन बेहतर हुआ है या नहीं। अगर सुधार के बजाय अव्यवस्था दिखेगी, तो सवाल उठेंगे और तुलना भी होगी। आज दिल्ली उसी तुलना के दौर से गुजर रही है, जहां जनता के मन में यह सवाल गूंज रहा है कि क्या राजधानी फिर से उस “दिल्ली मॉडल” की ओर लौटेगी, या मौजूदा हालात ही उसकी नई पहचान बन जाएंगे।

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