पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह सोमवार को अचानक यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ से मिलने उनके आवास पर पहुंच गए। दोनों की मुलाकात के बाद अटकलबाजी का दौर जारी है, कई मायनों में ये मुलाकात अहम बताई जा रही है।
21 जुलाई 2025 को लखनऊ स्थित मुख्यमंत्री आवास पर भाजपा के पूर्व सांसद और कुश्ती महासंघ (WFI) के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह ने अचानक मुलाकात की। करीब 30–60 मिनट तक बंद कमरे में हुई यह बैठक लंबे समय से दूरी बनाए रखे जा रहे दोनों नेताओं के बीच संवाद का संकेत है। इसे केवल “शिष्टाचार भेंट” बताया, लेकिन राजनीतिक विश्लेषण इसे बड़े मायने रखते हुए देख रहे हैं..

भविष्य की संभावनाएँ
- आने वाले दौर में क्या होगा शामिल?
2026 के पंचायत चुनाव और 2027 के विधानसभा चुनाव से पूर्व बृजभूषण को फिर से संगठनात्मक भूमिकाओं या चुनाव में सक्रिय भूमिका दी जा सकती है। - क्या यह सिर्फ डेमॉक्रेटिक प्रतीक है?
मुलाकात को ‘संकेत मात्र’ कहा जा रहा है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह BJP द्वारा लाइन में रखने की योजना का शुरुआती कदम हो सकता है। - संभावित असर
यदि बृजभूषण सक्रिय रूप से फिर सामने आए, तो यह यूपी बीजेपी में एक बड़े समीकरण को बदल सकता है—खासकर पूर्वांचल और Awadh में राजपूत और कुर्मी वोटों को लेकर।
सियासी पंडितों की राय
- आंतरिक संतुलन की तैयारी
बृजभूषण शरण सिंह का गोंडा, बैलरामपुर और आसपास के क्षेत्रों में राजपूत और कुर्मी वोटों पर प्रभाव रहा है। पार्टी उसकी वापसी के जरिए इन समूहों में संतुलन फिर वापस जोड़ना चाहती है । - पूर्व विवादों का हल
पिछले 2–3 वर्षों में उनके और प्रदेश नेतृत्व के बीच उठे मतभेद थे—कई बार बृजभूषण ने नीतियों पर सवाल उठाए, मंत्री-कार्यालयों के रवैये की आलोचना की। इस भेंट से इन दूरियों को मिटाने का संदेश जाता है। - केंद्रीय रणनीति का असर
यह मुलाकात दिल्ली में पीएम मोदी, अमित शाह और जे.पी. नड्डा से योगी की हालिया बैठकों के बाद हुई है, जिसे राज्य में संगठनात्मक बदलाव की प्रक्रिया के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है
निष्कर्ष
पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह की अचानक और खुली मुलाकात सीएम योगी आदित्यनाथ से न केवल व्यक्तिगत स्तर पर रिश्ता सुधारने की संकेत देती है, बल्कि यह भाजपा द्वारा आगामी चुनावों की रणनीतिक तैयारी, संगठनात्मक संतुलन और क्षेत्रीय समीकरणों में बदलाव के संकेत भी देती है। यादव, राजपूत, कुर्मी वोट बैंक के महत्त्व को देखते हुए यह मुलाकात यूपी की राजनीति में नए सत्ताधारी समीकरणों की पुनर्रचना का संकेत हो सकती है।