छठ पूजा ने इस बार न सिर्फ आस्था बल्कि अर्थव्यवस्था को भी नई रफ्तार दी. देशभर में 50,000 करोड़ रुपये से अधिक का व्यापार हुआ, जिससे स्थानीय बाजारों और छोटे व्यापारियों को बड़ा फायदा मिला.
छठ पूजा इस बार केवल आस्था और परंपरा का पर्व नहीं रहा, बल्कि उसने देश की अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा दी है। सूर्य उपासना और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा यह पर्व अब भारत के “स्वदेशी अर्थशास्त्र” की एक सशक्त मिसाल बन गया है। कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) द्वारा जारी एक ताजा अध्ययन के अनुसार, इस वर्ष छठ पूजा के दौरान देशभर में लगभग 50 हजार करोड़ रुपये का व्यापार हुआ, जिसने एक नया आर्थिक रिकॉर्ड बना दिया।

आस्था से अर्थव्यवस्था तक की यात्रा
कैट की रिपोर्ट के अनुसार, इस साल करीब 10 करोड़ से अधिक लोगों ने पूरे भारत में छठ पूजा मनाई। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और दिल्ली-एनसीआर जैसे क्षेत्रों में इस पर्व का सबसे अधिक आर्थिक प्रभाव देखने को मिला। जहां परंपरागत तौर पर छठ पूजा धार्मिक उत्साह और सामाजिक एकता का प्रतीक मानी जाती है, वहीं अब यह स्थानीय बाजारों और स्वदेशी उत्पादों के लिए एक बड़ा अवसर बन चुकी है।
दिल्ली में इस वर्ष 8 हजार करोड़, बिहार में 15 हजार करोड़, झारखंड में 5 हजार करोड़, जबकि बाकी राज्यों में मिलाकर कुल लगभग 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार हुआ। यह पिछले साल की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत अधिक है।
स्वदेशी अभियान ने दी नई उड़ान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “वोकल फॉर लोकल” और “स्वदेशी अपनाओ” अभियान का प्रभाव इस बार स्पष्ट रूप से बाजार में देखने को मिला। स्थानीय दुकानदारों, कुम्हारों, मिठाई विक्रेताओं, कपड़ा व्यापारियों और फल-सब्ज़ी विक्रेताओं को इस पर्व से बड़ी राहत मिली।
कुम्हारों द्वारा बनाए गए मिट्टी के दीये, सूप, टोकरी, और ठेकुआ के सांचे की बिक्री रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची। वहीं, बांस और लकड़ी के बने पारंपरिक सामानों की मांग इतनी बढ़ गई कि कई इलाकों में सप्लाई कम पड़ गई। दिल्ली के आजादपुर और पटना के बाजारों में फल और पूजा सामग्रियों के दामों में हल्की बढ़ोतरी के बावजूद ग्राहकों की भीड़ लगातार बनी रही।
कैट का विश्लेषण और आंकड़े
कैट के राष्ट्रीय महामंत्री एवं सांसद प्रवीन खंडेलवाल ने कहा कि इस अध्ययन का उद्देश्य भारत की पारंपरिक और सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था की ताकत को समझना है। उनके अनुसार, “छठ पूजा न केवल धार्मिक समरसता का प्रतीक है, बल्कि यह दर्शाती है कि भारतीय त्यौहार स्थानीय व्यापार, कारीगरों और किसानों के लिए किस तरह आर्थिक संजीवनी बन सकते हैं।”
खंडेलवाल ने बताया कि यह रिपोर्ट भारत की सनातन अर्थव्यवस्था पर चल रहे एक दीर्घकालिक अध्ययन का हिस्सा है, जिसमें प्रमुख त्यौहारों और विवाह सीजन के आर्थिक प्रभावों का विश्लेषण किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि “त्योहारों के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था में सालाना लाखों करोड़ रुपये का प्रवाह होता है, और यह स्वदेशी व्यापार के पुनर्जागरण का संकेत है।”
स्थानीय व्यापारियों के चेहरे पर मुस्कान
छठ पूजा के दौरान केवल पूजा सामग्रियों का ही नहीं, बल्कि मिठाई, कपड़ा, सजावट, इलेक्ट्रॉनिक्स और ट्रांसपोर्ट सेक्टर में भी तेज़ी देखी गई। बिहार के पटना, गया, भागलपुर और झारखंड के धनबाद जैसे शहरों में स्थानीय बाजारों में भीड़ इस बार पिछले वर्षों की तुलना में दोगुनी रही।
दिल्ली-एनसीआर में भी छठ घाटों के आसपास अस्थायी बाजारों ने स्थानीय व्यापार को नई गति दी। कई छोटे व्यवसायी और महिलाएं हस्तनिर्मित उत्पाद बेचती दिखीं, जिससे महिला उद्यमिता को भी बढ़ावा मिला।
त्योहारों से अर्थव्यवस्था को मिल रही नई पहचान
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था में त्योहारों का योगदान अब केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि वास्तविक आर्थिक इंजन के रूप में उभर रहा है। छठ पूजा जैसे त्योहार स्थानीय उत्पादों, ग्रामीण उद्योगों और छोटे व्यापारियों को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
पारंपरिक आस्था और आधुनिक अर्थशास्त्र के इस संगम ने यह साबित कर दिया है कि भारत में “त्योहार सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि आर्थिक अवसर भी हैं।”
इस बार की छठ पूजा ने न सिर्फ घाटों और बाजारों को रोशन किया, बल्कि करोड़ों भारतीयों की आजीविका को भी नई ऊर्जा दी — और इसी के साथ एक नया आर्थिक इतिहास रच दिया।