20 दिन, 4 मौतें… असम के हाथियों को किसकी नजर? वजहों की तलाश जारी

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DFO अहमद ने कहा कि हाथी भोजन की तलाश में जब जंगल छोड़कर अतिक्रमित क्षेत्रों में जाते हैं तो इस तरह की घटनाएं बढ़ती हैं. हाथियों के पारंपरिक रास्ते तेजी से सिकुड़ रहे हैं.

असम के उदलगुरी जिले में पिछले कुछ हफ्तों से वन्यजीव संरक्षण से जुड़ी एक गंभीर समस्या तेजी से सामने आ रही है। भूटान सीमा के नज़दीक स्थित यह इलाका हाथियों के पारंपरिक कॉरिडोर के रूप में जाना जाता है, लेकिन अब यही क्षेत्र इंसान-हाथी संघर्ष का हॉटस्पॉट बनता जा रहा है। पिछले 20 दिनों में 4 जंगली हाथियों की मौत ने वन विभाग, स्थानीय प्रशासन और वन्यजीव विशेषज्ञों को चिंतित कर दिया है। इनमें तीन हाथियों की मौत करंट लगने से हुई है, जबकि एक की मौत जहरीला पदार्थ निगलने की आशंका के कारण मानी जा रही है।

20 दिन, 4 मौतें… असम के हाथियों को किसकी नजर? वजहों की तलाश जारी
20 दिन, 4 मौतें… असम के हाथियों को किसकी नजर? वजहों की तलाश जारी

पिछले एक साल का खतरनाक ट्रेंड

वन विभाग के रिकॉर्ड बताते हैं कि सिर्फ उदलगुरी जिले में पिछले 12 महीनों में 14 हाथियों की मौत हो चुकी है। इनमें से 10 की मौत इलेक्ट्रोक्यूशन से हुई है। यह आंकड़ा बताता है कि हाथियों और इंसानों के बीच बढ़ रहा संघर्ष किस गति से बढ़ रहा है। यह स्थिति न सिर्फ वन्यजीव संरक्षण के लिए खतरनाक है, बल्कि स्थानीय ग्रामीणों के लिए भी बड़ा जोखिम बनती जा रही है।

करंट लगने से मौत क्यों? मुख्य वजहें

करंट लगने से मौत क्यों? मुख्य वजहें
करंट लगने से मौत क्यों? मुख्य वजहें

1. हाई-वोल्टेज बिजली लाइनों का जंगल क्षेत्रों में विस्तार

उदलगुरी व इसके आसपास के इलाकों में कई गांव जंगलों की सीमा से सटे हुए हैं। जगह-जगह बिजली के खंभे और खुले तार गुजरते हैं। हाथी अक्सर भोजन की तलाश में इन क्षेत्रों में आते हैं और अनजाने में तारों के संपर्क में आ जाते हैं।

2. किसानों द्वारा खेतों की सुरक्षा के लिए अवैध बिजलीकरण

स्थानीय किसान अपने धान व सब्जी के खेतों को जंगली जानवरों से बचाने के लिए बाड़ पर बिजली प्रवाहित कर देते हैं। कई मामलों में इसी अवैध बिजली प्रवाह से हाथियों की मौत दर्ज हुई है।
वन विभाग इसे इंसान-हाथी संघर्ष की सबसे खतरनाक प्रवृत्ति मानता है।

3. कम होती वनस्पति और सिकुड़ता आवास

विस्तृत मानवीय बस्ती और खेती ने हाथियों के प्राकृतिक मार्गों को बाधित कर दिया है। रास्ते बदले, जंगल कम हुए और हाथी अब गांवों में भटकने लगे हैं, जिससे दुर्घटनाओं की संभावना कई गुना बढ़ गई है।

जहर खाने की आशंका कैसे बनी?

20 दिन में जिन 4 हाथियों की मौत हुई है, उनमें से एक का पोस्टमॉर्टम बताता है कि उसके शरीर में संभावित विषाक्त पदार्थ मिले हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि:

  • कुछ ग्रामीण हाथियों से तंग आकर खेत बचाने के लिए कीटनाशकों या रसायनों में लिपटी फल-सब्जियां रख देते हैं।
  • हाथी इन्हें खा लेते हैं और उनकी तबीयत बिगड़ने लगती है, कई बार मौत तक हो जाती है।

हालांकि, वन विभाग मामले की फॉरेंसिक जांच कर रहा है ताकि यह पुष्टि हो सके कि मौत जानबूझकर की गई है या दुर्घटनावश

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार:

  • उदलगुरी-रंगिया बेल्ट असम के सबसे संवेदनशील हाथी कॉरिडोरों में है।
  • यहां इंसानी बस्तियां इतनी बढ़ गई हैं कि हाथियों के पारंपरिक रास्ते बाधित हो गए हैं।
  • हाथियों को पर्याप्त भोजन व पानी न मिलने की वजह से वे गांवों में प्रवेश कर रहे हैं।
  • ऐसे हालात में बिजली के तार, रसायन, खेतों में लगाए ट्रैप हाथियों के लिए घातक साबित हो रहे हैं।

वन विभाग के प्रयास

असम वन विभाग और स्थानीय प्रशासन ने निम्न कदम उठाए हैं:

  • हाई-वोल्टेज तारों को शिफ्ट करने का प्रस्ताव भेजा गया है।
  • ग्रामीणों को बिजलीकरण वाले जाल लगाने पर सख्त चेतावनी।
  • हाथियों की आवाजाही वाले इलाकों में फॉरेस्ट पेट्रोलिंग बढ़ाई गई है।
  • “मानव-हाथी सह-अस्तित्व” के लिए जागरूकता अभियान।
  • संभावित विषाक्तता वाले मामले की विस्तृत जांच।

लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इन उपायों को तेजी से और बड़े पैमाने पर लागू करने की जरूरत है, वरना आने वाले महीनों में और भी बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है।

अंतिम निष्कर्ष

उदलगुरी जिले में लगातार हाथियों की मौतें केवल एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि असम में तेजी से बदलते पर्यावरण और असंतुलित विकास को भी उजागर करती हैं।
अगर समय रहते बिजली अवसंरचना को सुरक्षित न किया गया और हाथियों के प्राकृतिक आवासों की रक्षा नहीं की गई, तो आने वाले समय में यह संकट बहुत गंभीर रूप ले सकता है।

अभी की स्थिति वन्यजीव प्रबंधन के लिए रेड अलर्ट की तरह है और समय है कि सरकार, वन विभाग, और स्थानीय समुदाय मिलकर इस संकट के समाधान के लिए ठोस कदम उठाएं।

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