जीतन राम मांझी ने कहा कि 82 साल की उम्र में चुनाव लड़े हैं, अब 85 साल में लड़ेंगे कि नहीं अगली बार देखेंगे क्या होगा. उन्होंने नीतीश कुमार की प्रशंसा भी की है.
बिहार में लागू शराबबंदी कानून एक बार फिर चर्चा में है, और इस बार सुर्खियों में हैं केंद्रीय मंत्री और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) के प्रमुख जीतन राम मांझी। मांझी अक्सर शराबबंदी को लेकर अपने बेबाक और विवादित बयानों के लिए जाने जाते हैं, लेकिन इस बार उन्होंने ऐसा बयान दिया जिसने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। गयाजी में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि शराब का सेवन अगर करना ही है तो ‘फायदे वाली शराब’ पीनी चाहिए— जो महुआ और ईख के रस से बनाई जाती है।

रविवार (07 दिसंबर, 2025) को गया जिले में एक कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे मांझी ने शराबबंदी, पुलिस कार्रवाई और सामाजिक प्रभाव पर खुलकर बात की। अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि शराबबंदी कानून गरीबों और मजदूरों को अधिक परेशान कर रहा है, जबकि बड़े स्तर पर शराब की तस्करी करने वालों पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं होती।
“शराबबंदी की फिर समीक्षा होनी चाहिए” — मांझी

जीतन राम मांझी ने कहा कि उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को शराबबंदी की “तीसरी समीक्षा” के लिए प्रस्ताव भेजा है। मांझी ने दावा किया कि उन्होंने समीक्षा में यह सुझाव दिया है कि छोटे मजदूर, जो दिनभर काम करने के बाद थोड़ी शराब पी लेते हैं, उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, ऐसे लोगों को सजा देना अमानवीय और अव्यवहारिक है, जबकि बड़े स्तर पर शराब सप्लाई करने वाले गैंग पर पुलिस की कार्रवाई बेहद कमजोर रहती है।
मांझी ने कहा,
“कोई मजदूर दिनभर मेहनत करके एक घूंट पीकर घर जा रहा है तो पुलिस उसे पकड़ लेती है। लेकिन हजारों-हजारों गैलन शराब तस्करी करने वाले गट्टा भरकर छोड़ दिए जाते हैं। यह अन्याय है।”
“हमारे पिता बनाते थे महुआ और ईख का रस— वही शराब पीजिए, फायदा करेगा”
अपने भाषण के सबसे विवादित हिस्से में मांझी ने कहा,
“हमारे पिता महुआ और ईख के रस से शराब बनाते थे। वह शराब पीजिए, फायदा करेगा। आज हमारे समाज पर पांच लाख मुकदमे हैं।”
उनका यह बयान सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में तेजी से वायरल होने लगा। बयान के समर्थक इसे ‘पारंपरिक शराब’ को बढ़ावा देने की सलाह के रूप में देख रहे हैं, जबकि विरोधी दल इसे शराबबंदी कानून के विरोध और लोगों को शराब पीने के लिए प्रेरित करने वाली टिप्पणी बता रहे हैं।
मांझी ने यह भी कहा कि महुआ से बनी शराब को उनकी नजर में प्राकृतिक, आयुर्वेदिक और कम हानिकारक माना जाता है। उन्होंने तर्क दिया कि ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षों से लोकल स्तर पर ऐसी देसी शराब बनाई जाती थी, जिसे कठोर कानूनों के चलते अब अपराध की श्रेणी में डाल दिया गया है।
शराबबंदी पर जारी बहस का नया अध्याय
बिहार में 2016 से पूर्ण शराबबंदी लागू है और सरकार का दावा है कि इससे अपराध दर में कमी और सामाजिक बदलाव देखने को मिला है। हालांकि विपक्ष और कई सामाजिक संगठनों का कहना है कि शराबबंदी ने तस्करी, जहरीली शराब और पुलिस की मनमानी को बढ़ावा दिया है।
मांझी खुद कई बार कह चुके हैं कि यह कानून गरीबों पर बोझ बन गया है और इसकी समीक्षा आवश्यक है।
उनका यह बयान उसी बहस को एक नया मोड़ देता है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि मांझी की यह टिप्पणी दलित और महादलित समुदाय के बीच उनकी पकड़ मजबूत करने की एक रणनीति भी हो सकती है, क्योंकि ऐसे समुदाय पारंपरिक रूप से महुआ से तैयार पेय का उपयोग करते आए हैं।
सरकार और विपक्ष की संभावित प्रतिक्रिया
मांझी भले ही एनडीए का हिस्सा हों लेकिन शराबबंदी को लेकर उनका लगातार विरोध NDA के भीतर भी असहज स्थिति पैदा करता रहा है। उम्मीद है कि भाजपा और जदयू के नेता उनके इस बयान पर प्रतिक्रिया देंगे।
वहीं RJD और कांग्रेस जैसे विपक्षी दल मांझी के बयान को सरकार की नीतिगत असफलता का परिचायक बताकर इसे राजनीतिक मुद्दा बना सकते हैं।
सोशल मीडिया में गरमा गई बहस
सोशल मीडिया पर भी यह बयान खूब ट्रेंड कर रहा है। कुछ लोग इसे मांझी की बेबाकी मान रहे हैं, जबकि अन्य इसे शराबबंदी की धज्जियां उड़ाने वाला बयान बता रहे हैं। कई यूजर्स ने मांझी का वीडियो शेयर करते हुए लिखा कि “सरकारी मंत्री ही शराब पीने का तरीका बता रहे हैं, तो कानून का क्या मतलब?”
निष्कर्ष
जीतन राम मांझी का यह बयान न सिर्फ शराबबंदी कानून, बल्कि बिहार की राजनीतिक बहस को भी फिर से गर्म कर गया है। ऐसे समय में जब राज्य में शराब से जुड़े मामलों पर लगातार विवाद सामने आ रहे हैं, मांझी की टिप्पणी नई राजनीतिक उथल-पुथल का संकेत देती है। देखना होगा कि सरकार इस पर क्या रुख अपनाती है और क्या शराबबंदी कानून में भविष्य में वास्तव में कोई संशोधन संभव है।
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