सीबीआई ने आज ही RCOM और इसके प्रमोटर अनिल अंबानी के खिलाफ एसबीआई की शिकायत पर केस दर्ज करके मुम्बई में सर्च शुरू की है। सर्च के बाद सीबीआई आधिकारिक तौर पर जानकारी देगी। जानें क्या है पूरा मामला?
देश के कॉर्पोरेट जगत में हलचल मचाने वाले 17,000 करोड़ रुपये के कथित धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग मामले ने नया मोड़ ले लिया है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) की हालिया छापेमारी के बाद अब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) भी सक्रिय हो गया है। सूत्रों के अनुसार, CBI ने उद्योगपति अनिल अंबानी के आवास और दफ्तर सहित कई ठिकानों पर छापेमारी की है। इस कार्रवाई को मनी लॉन्ड्रिंग और बैंकिंग घोटाले की गहन जांच की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

मामला क्या है?
यह पूरा मामला लगभग 17,000 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय अनियमितताओं और बैंकों से लिए गए कर्ज के गलत इस्तेमाल से जुड़ा है। आरोप है कि रिलायंस समूह से जुड़ी कुछ कंपनियों ने बैंकों से भारी-भरकम ऋण लिया और फिर उसे अन्य रास्तों में खपा दिया। जांच एजेंसियों का कहना है कि इस रकम का उपयोग वास्तविक कारोबारी गतिविधियों में नहीं किया गया बल्कि इसे शेल कंपनियों और विदेशों में संदिग्ध निवेश के जरिए खपाया गया।
ED की भूमिका
प्रवर्तन निदेशालय (ED) पहले ही इस मामले में कई छापेमारी कर चुका है। ED ने पिछले महीने अनिल अंबानी के घर समेत कई ठिकानों पर सर्च ऑपरेशन चलाया था और बड़ी मात्रा में डिजिटल डाटा, दस्तावेज और लेन-देन से जुड़े सबूत अपने कब्जे में लिए थे। ED की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के आधार पर यह संकेत मिला कि रकम का इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग में हुआ, जिसके चलते मामला और गंभीर हो गया।
अब CBI की एंट्री
ED की जांच के बाद अब CBI इस पूरे मामले की गहन पड़ताल कर रही है। CBI ने आरोपियों की सूची तैयार करते हुए उनके खिलाफ प्राथमिक जांच शुरू कर दी है। शुक्रवार सुबह से शुरू हुई छापेमारी में CBI अधिकारियों ने अंबानी परिवार से जुड़े कई परिसरों में दस्तावेज खंगाले और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की जांच की। सूत्र बताते हैं कि CBI का फोकस इस बात पर है कि कर्ज की रकम का उपयोग कहां और कैसे किया गया तथा इसमें किन-किन व्यक्तियों या कंपनियों की भूमिका रही।
बैंकों का बड़ा नुकसान
इस कथित धोखाधड़ी से देश के कई बड़े बैंकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। जिन बैंकों से कर्ज लिया गया उनमें सरकारी और निजी क्षेत्र दोनों के बैंक शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार, बैंकों का करीब 17,000 करोड़ रुपये का ऋण NPA (नॉन परफॉर्मिंग एसेट) में बदल गया है। यह रकम भारतीय बैंकिंग सेक्टर के लिए बड़ी चुनौती मानी जा रही है, खासकर ऐसे समय में जब सरकार और रिजर्व बैंक लगातार बैंकों को मजबूत करने की दिशा में कदम उठा रहे हैं।
अनिल अंबानी का पक्ष
अनिल अंबानी की ओर से अब तक किसी आधिकारिक बयान की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन करीबियों का कहना है कि वे जांच एजेंसियों के साथ सहयोग कर रहे हैं। अंबानी का पक्ष है कि कर्ज की रकम का इस्तेमाल व्यवसायिक विस्तार और निवेश के लिए किया गया था और किसी भी तरह की धोखाधड़ी का इरादा नहीं था। उन्होंने पूर्व में भी कई मौकों पर वित्तीय मुश्किलों और कारोबारी घाटे का हवाला देते हुए खुद को निर्दोष बताया है।
राजनीतिक और आर्थिक हलचल
इतने बड़े घोटाले की जांच से राजनीतिक गलियारों में भी हलचल मच गई है। विपक्षी दलों ने सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब बैंकिंग घोटाले हो रहे थे तब नियामक संस्थाएं चुप क्यों थीं। वहीं सत्तापक्ष का कहना है कि सरकार की शून्य- सहनशीलता नीति के तहत ही इस तरह की जांच हो रही है, जिससे बड़े उद्योगपति भी अब कानून से बच नहीं पाएंगे।
आगे की राह
CBI और ED दोनों की संयुक्त जांच से यह मामला और गंभीर हो सकता है। अगर जांच में आरोप साबित होते हैं तो न केवल अनिल अंबानी बल्कि इस पूरे नेटवर्क से जुड़े कई लोग कानूनी शिकंजे में आ सकते हैं। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में और भी गिरफ्तारियां और खुलासे हो सकते हैं।
निष्कर्ष
17,000 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी का यह मामला भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास के सबसे बड़े मामलों में गिना जा सकता है। ED के बाद CBI की सक्रियता से साफ है कि जांच अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। बैंकों और निवेशकों को हुए भारी नुकसान के बीच सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच के नतीजे क्या सामने आते हैं और क्या वास्तव में कानून बड़े उद्योगपतियों पर भी समान रूप से लागू होता है।
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