मेरे पिता एक प्रोफेसर थे। वे अनेक युवा विद्यार्थियों के मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत थे। उन्होंने बचपन से मुझे एक बात सिखाई थी— “असफल होना ठीक है, लेकिन धोखा देना कभी ठीक नहीं। कभी भी शॉर्टकट मत अपनाओ।”
समाज के जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हमारी जिम्मेदारी है कि हम ऐसी संस्कृति का निर्माण करें। यदि कोई समाज मेहनत से अधिक केवल परिणामों को महत्व देगा, तो वहां योग्यता के बजाय शॉर्टकट अपनाने की प्रवृत्ति बढ़ेगी।
आज यदि छात्रों को यह महसूस हो रहा है कि उनकी कड़ी मेहनत का उचित सम्मान नहीं हुआ, तो उनकी निराशा स्वाभाविक है। हम सभी को मिलकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य में उन्हें ऐसा महसूस न करना पड़े।
भारत का युवा सपनों और ऊर्जा से भरा हुआ है। वही हमारी सफलता की सबसे बड़ी ताकत है। माता-पिता, शिक्षक, मित्र, रिश्तेदार, स्कूल और प्रशासन—समाज के हर वर्ग की जिम्मेदारी है कि हमारे युवाओं का उत्साह बना रहे और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा मिलती रहे।
हमें ऐसी संस्कृति विकसित करनी होगी, जहां मेहनत का सम्मान हो, ईमानदारी को प्रोत्साहन मिले और योग्यता की जीत हो।
मुझे पूरा विश्वास है कि हम सभी मिलकर ऐसे समाधान खोजेंगे, जो हमारे बच्चों के भविष्य को मजबूत करेंगे और उनके सपनों व आकांक्षाओं की रक्षा करेंगे।
जय हिंद!